सियासी आरोप खूब लगे, लेकिन राम नाईक ने फैसले संविधान के मुताबिक ही लिये

सियासी आरोप खूब लगे, लेकिन राम नाईक ने फैसले संविधान के मुताबिक ही लिये

संजय सक्सेना | Jul 26 2019 11:50AM
उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक का पांच साल का कार्यकाल रविवार (21 अगस्त 2018) को पूरा हो जाएगा। गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री और मध्य प्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल उनकी जगह लेंगी। यूपी के गवर्नर के रूप में पांच वर्ष पूरे कर चुके राम नाईक के कार्यकाल को दो हिस्सों (राम नाईक का आधा कार्यकाल अखिलेश सरकार में आधा योगी राज में गुजरा) में बांट कर देखा जाए तो उनके पूरे कार्यकाल को किसी ने आधा भरा गिलास के रूप में देखा तो किसी ने आधा खाली गिलास के रूप में। पांच वर्षों में राम नाईक ने जो फैसले लिए, उनकी धमक जनता के साथ सत्ता भी लगातार महसूस करती रही। अखिलेश सरकार लगातार राम नाईक से परेशान दिखी तो योगी सरकार के लिए नाईक कभी मुश्किलों का कारण नहीं बने।
 
पूर्व के राज्यपालों की परंपरा को तोड़ते हुए नाईक ने सरकार को कई फैसलों को अपने हिसाब से कसौटी पर कसा। राजभवन पर सियासी होने के भी आरोप खूब लगे, तो नाईक ने संविधान का हवाला देकर अपने आप को सही ठहराया। राज्यपाल जैसे गैर राजनैतिक पद पर होने के बाद भी नाईक उत्तर प्रदेश की राजनीति में हर पल अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे। आनंदी पटेल के लिए अपनी नई तैनाती में सबसे बड़ी परीक्षा की घड़ी यही होगी कि वह न केवल राम नाईक के बराबर अपने को खड़ा करें। इसी तरह से महिला राज्यपाल होने के नाते आनंदी पटेल को सरोजनी नायडू के स्थापित आदर्शों को भी याद रखना होगा। सरोजनी नायडू के बाद आनंदी पटेल दूसरी महली गवर्नर हैं।
खैर, बात राम नाईक की कि जाए तो सक्रिय राजनीति में चार दशक बिताने के बाद 26 मई 2014 को केन्द्र में मोदी सरकार बनने के पश्चात 22 जुलाई 2014 को राम नाईक ने यूपी के राज्यपाल के पद के रूप में शपथ ली थी। अपने से पूर्ववर्ती राज्यपाल बीएल जोशी से अलग नाईक ने राजभवन को आरामगाह बनाने की जगह सक्रियता की नई परिभाषा से जोड़ दिया। सड़क पर पेड़ गिरने से रास्ता रुकना हो, क्लब में वेशभूषा के चलते किसी की एंट्री पर रोक या पिछली सरकार के सबसे ताकतवर मंत्री के तेवर ढीले करने हों... राजभवन हर जगह सुर्खियां बटोरता रहा। 10 से अधिक भाषाओं में प्रकाशित हुई नाईक की पुस्तक 'चरैवेति! चरैवेति' भी खूब चर्चा में रही।
 
राम नाईक की मुखर टिप्पणियां अखिलेश यादव सरकार के लिए खास तौर पर मुसीबत बनती रहीं। विधान परिषद में मनचाहे चेहरों को एमएलसी नामित करवाने की पिछली समाजवादी सरकार की कोशिशों पर भी नाईक भारी पड़े। यह शायद पहली बार था जब सरकार की ओर से भेजे गए चार नामों को मेरिट के आधार पर राजभवन ने स्वीकारने से मना कर दिया। कई बार की चिट्ठी−पत्री के बाद भी कुछ चेहरे आखिरकार विधान परिषद नहीं पहुंच पाए। उसमें से एक को आखिरकार अखिलेश यादव ने राज्यसभा भेजा। इसी तरह लोकायुक्त की नियुक्ति में भी पहली बार इतिहास बना कि खुद सुप्रीम कोर्ट को लोकायुक्त नियुक्त करना पड़ा। अखिलेश के भेजे नामों को चयन समिति की सहमति न होने के कारण राज्यपाल ने चार बार वापस किया।
 
अपने पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा करने जा रहे राज्यपाल राम नाईक यह बताने को तैयार नहीं दिखे कि अखिलेश और योगी सरकार में बेहतर कौन है। उनका मानना है कहा कि सरकार के कामकाज का मूल्यांकन जनता करती है। जिस तरह से दो बच्चों के काम की तुलना नहीं की जा सकती, उसी तरह से वे अपने कार्यकाल में रहीं अखिलेश और योगी सरकार के कामकाज की तुलना नहीं कर सकते। इतना जरूर कहेंगे कि अखिलेश यादव और योगी आदित्यनाथ, दोनों के ही साथ उनके बेहतर रिश्ते रहे।
राज्यपाल राम नाईक की बातों में दम लगता है कि उनके अखिलेश से अच्छे संबंध थे। अखिलेश यादव ने 15 जून 2019 को राज्यपाल राम नाईक से राजभवन में मुलाकात की। इस दौरान अखिलेश ने राज्यपाल को प्रदेश की कानून व्यवस्था के मद्दे पर ज्ञापन सौंपा। अखिलेश ने राज्यपाल से कहा कि वो कानून व्यवस्था पर योगी सरकार को जगाएं। साथ ही अखिलेश ने राज्य में जंगलराज होने की बात कही। उन्होंने कहा कि सपा नेता आजम खान के खिलाफ झूठे मुकदमे किए गए हैं।
 
राम नाईक दूसरों में खामियां निकालने तक ही सीमित नहीं थे। वह अपना भी आकलन करते थे। उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक ने जब अपने कार्यकाल का आधा सफर पूरा किया तो उन्होंने अपना रिपोर्ट कार्ड जारी करने की अपनी परंपरा भी बनाए रखी। राम नाईक का यह व्यवहार सार्वजानिक जीवन के लोगों के लिए एक मिसाल है। वे तीन बार विधायक और पांच बार लोकसभा सदस्य निर्वाचित हुए, केन्द्र में मंत्री बने, विपक्ष में रहे, सभी दायित्वों में रिपोर्ट कार्ड जारी करना नहीं भूलते थे। एक समय था जब उनके पास कोई दायित्व नहीं था, तब भी उन्होंने सार्वजनिक जीवन पर रिपोर्ट कार्ड जारी किया। राज्यपाल के रूप में भी इस परंपरा को छोड़ा नहीं। यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है जो व्यक्ति अपना रिपोर्ट कार्ड जारी करता है, वह अपने नियत दायित्वों के निर्वाह के प्रति भी जागरूक रहता है।
 
यहां अखिलेश और राम नाईक के रिश्तों की खटास के बारे में बात करना भी जरूरी है, जिसकी सबसे बड़ी वजह अखिलेश सरकार में तत्कालीन कैबिनेट मंत्री आजम खान रहे। आजम सड़क से सदन तक नाईक पर हमला बोलते रहे। उन्हीं की तर्ज पर सपा के अखिलेश यादव ही नहीं बसपा की मायावती सहित अन्य तमाम नेताओं ने भी राजभवन के भगवाकरण का आरोप लगाया, लेकिन सबका जवाब राज्यपाल की कलम ने दिया। अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष को कैबिनेट मंत्री का दर्जा देने का मामला रहा हो, मेयर−नगर पालिका प्रमुखों के अधिकारों की कटौती के लिए लाया गया विधेयक हो या जिला पंचायत, क्षेत्र पंचायत अध्यक्ष के अधिकारों में कटौती की बात। आजम के मंसूबे राजभवन की दहलीज पार नहीं कर पाए। नाराज आजम खान ने सदन के मंच से राज्यपाल पर आपत्तिजनक टिप्पणियां तक कर डालीं। राज्यपाल ने कार्यवाही मांगी तो सदन के इतिहास में पहली बार किसी मंत्री के भाषण का 33 फीसदी हिस्सा बाहर कर दिया गया। नाईक ने इसका आधार बनाकर आजम के मंत्री बने रहने की योग्यता पर ही सवाल खड़े कर दिए।
 
आज आजम खान जौहर विश्वविद्यालय को लेकर घिरे हुए हैं तो इसकी वजह भी राम नाईक ही हैं। 13 जुलाई 2019 को राज्यपाल नाईक ने उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार को पत्र लिख कर सिफारिश कर डाली कि रामपुर की जौहर यूनिवर्सिटी का अधिग्रहण किया जाए। जौहर विवि को लेकर यह उनका दूसरा पत्र था। इस पत्र में उन्होंने लिखा था कि उनसे उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के उपाध्यक्ष फैसल खान लाला ने मुलाकात कर इस यूनिवर्सिटी में कई अनियमितताओं की शिकायत की है। बता दें कि कांग्रेस के नेता फैसल खान ने समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान पर आरोप लगाया है कि उनका जौहर ट्रस्ट मुसलमानों के नाम पर सरकारी धन, यतीमों−किसानों और सरकारी जमीनें हड़पने की मशीन है। कांग्रेस नेता फैसल लाला ने जौहर यूनिवर्सिटी के अधिग्रहण को लेकर 8 जुलाई को राज्यपाल राम नाईक से मिलकर उन्हें ज्ञापन सौंपा था।
   
बहरहाल, अन्य मसलों पर बात की जाए तो जवाहर बाग कांड हो या कानून−व्यवस्था से जुड़े मसले, नाईक की सक्रियता ने अखिलेश सरकार के पसीने छुड़ा दिए। सत्ता बदलने के बाद जरूर एसपी, बीएसपी, कांग्रेस सहित समूचा विपक्ष नाईक पर योगी सरकार पर नरम रहने का आरोप लगाता रहा। हालांकि, मौजूदा सरकार में भी मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव के खिलाफ हुई शिकायत को जांच के लिए राजभवन से आगे बढ़ाया जाना सुर्खियों में रहा।
 
-संजय सक्सेना
 

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