विश्लेषण

एससी−एसटी एक्ट पर सवर्णों की बेचैनी नहीं समझ रहे राजनीतिक दल

By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Sep 10 2018 2:50PM

राजनीतिक दलों की वोटों के लिए दलितों की राजनीति से देश का एक बड़ा वर्ग बैचेन है। इस बहुसंख्यक वर्ग के भारत बंद के दौरान किसी भी राजनीतिक दल में इतना साहस नहीं रहा कि इसके समर्थन में या खिलाफ खड़ा होने की हिम्मत दिखाएं। केंद्र और राज्यों के सभी सत्तारूढ़ दल और विपक्षी दल इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देने तक से बचते रहे। जबकि समाज का बड़ा वर्ग ज्वालामुखी की तरह अन्दर ही अन्दर धधक रहा है। राजनीतिक दल इस सच्चाई से आंखे फेरे हुए हैं। चंद नेताओं और वोट बैंक के लालच में सुप्रीम कोर्ट के आदेश को धता बताते हुए ससंद के जरिए संशोधन को समर्थन देने वाले सभी दलों ने इस पर बहस तक करना जरूरी नहीं समझा। जबकि गैर जरूरी मुद्दों पर सत्तापक्ष और विपक्ष नूराकुश्ती करते हुए दिखाई पड़ते हैं।

इसके विपरीत अब जब देश का बड़ा हिस्सा इसके खिलाफ आवाज उठा रहा है, तो दलों की बोलती बंद है। आखिर इतने बड़े वर्ग की उपेक्षा कब तक बर्दाश्त की जाती रहेगी। राजनीतिक दल इस मुद्दे पर सार्वजनिक बहस करने तक से कतरा रहे हैं। उन्हें डर है कि बहस करते ही वोट बैंक खिसक जाएगा। देश का प्रतिनिधित्व करने वाले दलों को इसका खुलासा करना चाहिए था कि आखिर उन्होंने एससी-एसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ संशोधन को सहमति किस आधार पर दी है। इसके नुकसान−फायदों पर खुली चर्चा करने के बजाए राजनीतिक दलों की चुप्पी साबित करती है कि यह मुद्दा जलती आग जैसा है। इसमें कोई भी दल हाथ नहीं डालना चाहता।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलटने के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शन पर राजनीतिक दल जितना बचना का प्रयास करेंगे, उतना ही यह मुद्दा देश में असंतोष का कारण बनेगा। लोकतंत्र में सबको अपनी बात कहने का हक है। अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक के आधार पर किसी की आवाज को दबाया नहीं जा सकता। सुप्रीम कोर्ट द्वारा समलैंगिक कानून के खात्मे पर दिया गया फैसला इसकी ताजा नजीर है। जबकि इस कानून को खत्म कराने का समर्थन करने वालों की संख्या देश की आबादी के हिसाब से नगण्य है, इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने उनका पक्ष सुना और फैसला भी उनके पक्ष में दिया। फिर देश की बहुसंख्यक आबादी की आवाज की अनसुनी कैसे की जा सकती है। यही वजह है कि भाजपा−कांग्रेस सहित अन्य राजनीतिक दलों को मध्यप्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में इस मुद्दे पर विरोध झेलना पड़ रहा है। दिखाने को राजनीतिक दल भले ही देष की एकता−अखंडता और देशभक्ति की दुहाई दें किन्तु हकीकत यही है कि सभी दल आरक्षण और एससी-एसएटी एक्ट के औचित्य और सार्थकता पर बहस करने को तैयार नहीं हैं। आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान किए जाने के बाद से राजनीतिक दलों में इतना भी साहस नहीं बचा कि आरक्षित वर्ग को मिले आरक्षण के फायदें की वास्तविक जांच करा सकें। इसके असली हकदारों की पैरवी कर सकें। यही वजह है कि आरक्षण का लाभ उसके वास्तविक हकदारों तक पहुंचने के बजाए चुनिंदा लोगों तक सीमित रह गया है। क्रीमी लेयर के मुद्दे पर एक भी राजनीतिक दल मंुह खोलने को तैयार नहीं है। जबकि आरक्षित वर्ग से ही क्रीमी लेयर को बाहर किए जाने की मांग की जाती रही है।

संविधान में आरक्षण का प्रावधान होने के बाद समीक्षा ही नहीं की गई, आरक्षित जातियों का इस अवधि में कितना भला हुआ। आरक्षित वर्ग में मौजूद क्रीमी लेयर ही आरक्षण का बड़ा हिस्सा हड़प रही है। आरक्षण से दलितों−पिछड़ों के जीवन में कितना परिवर्तन आया है, वास्तविक जीवन में इसका हाल गांव, कस्बों और षहरों के कोनों में बसी बस्तियों में देखा जा सकता है। दरिद्रता वहां पूरी तरह पसरी हुई मिलेगी। खासकर गांवों में सार्वजनिक स्थानों से पेयजल लेना भी इनके लिए आसान नहीं हैं। दलित आज भी सफाई जैसे सामाजिक दृष्टि से हेय समझे जाने वाले कार्यों से जुड़े हुए है। नालों और सीवरेज में काम करने के दौरान हर साल सफाईकर्मियों की मौतों की खबरें आती रहती हैं। ऐसी दुर्घटनाओं पर राजनीतिक दल मगरमच्छ के आंसू बहाते नजर आते है। मजबूरी में किए जाने वाले इस नारकीय कार्य से किसी राजनीतिक दल और सरकारों को परहेज नहीं है।

इनकों केवल आरक्षण का झुन्झुना और एससी-एसटी एक्ट थमा कर सरकारों ने अपने को जिम्मेदारी से मुक्त मान लिया। इनकी आबादी की तुलना में कितने प्रतिषत लोगों को आरक्षण का फायदा मिला, इसकी जानकारी कराने से सरकारें कतराती रही हैं। आरक्षण और उसके बाद एससी-एसटी कानून बना कर सरकारों ने देश को सीधे दो हिस्सों में बांट वैमनस्यता उत्पन्न करने का काम किया है। गैर आरक्षित वर्ग द्वारा भारत बंद आंदोलन इसी आक्रोश का परिणाम है। इसके विपरीत यदि राजनीतिक दलों को वाकई देश को एकजुट रखने की चिंता होती तो आरक्षण का विकल्प तलाशा जा सकता था। पिछड़े और दलितों की यदि आर्थिक और शैक्षिक हालत की सुध ली जाती तो आरक्षण का प्रावधान किए जाने की नौबत ही नहीं आती।

ज्यादातर दलित और आदिवासी सदियों से परंपरागत रोजगारों से जुड़े हुए हैं। इन्हें आसान ऋण, आधुनिक तकनीक की सुविधा उपलब्ध करा कर आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में प्रयास ही नहीं किए गए। यह काम दुष्कर नहीं पर सरकारों को ऐसे प्रयासों पर भरोसा नहीं है। सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार का अजगर इस कदर पसरा हुआ है कि योजनाओं का वास्तविक लाभ इन्हें नहीं मिल पाता। इस सच्चाई से बचने के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण का ख्वाब दिखाया गया। आरक्षित या गैर आरक्षित वर्ग की आबादी के हिसाब से इतनी नौकरियां संभव ही नहीं हैं कि सभी जरूरतमंदों को रोजगार दिया जा सके। सरकारें बखूबी इस हालात से वाकिफ हैं, किन्तु ऐसी दीर्घकालिक संपूर्ण विकास की योजनाओं के बजाए आरक्षण जैसा मुद्दा तात्कालिक फायदे के लिए राजनीतिक दलों को मुफीद लगता है। यही वजह है कि सत्ता में चाहे जिस भी दल की सरकार रहीं हों, इस वास्तविकता से भागती रहीं हैं कि आरक्षण से नाममात्र का फायदा हुआ है, पिछड़ों और दलितों का बहुसंख्यक वर्ग तो आज भी आम नागरिकों अधिकारों से दूर शोचनीय हालात में है। राजनीतिक दलों ने सिर्फ इनका इस्तेमाल अपने वोट बैंक के लिए किया है। यही वजह है कि एक भी दल आरक्षण और एससी-एसटी कानून की व्यवहारिकता पर मुंह खोलने को तैयार नहीं हैं।

-योगेन्द्र योगी

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