जिंदगी भर की मेहनत से बनाई पार्टी का यह हश्र देखकर बेहद आहत हैं मुलायम

जिंदगी भर की मेहनत से बनाई पार्टी का यह हश्र देखकर बेहद आहत हैं मुलायम

अजय कुमार | May 30 2019 12:03PM

राजनीति 'बैसाखी' के सहारे नहीं चलती है। यह बात सपा प्रमुख अखिलेश यादव से बेहतर कौन समझ सकता है। 2014 में जब समाजवादी पार्टी पांच सीटों पर सिमट गई थी, तब ऐसा लगा कि यह मोदी लहर का असर है। मगर, 2017 के विधान सभा चुनावों में भी यही इतिहास दोहराया गया। जब अखिलेश ने राहुल गांधी से हाथ मिलाया था तो लग रहा था कि दो युवाओं की जोड़ी विधानसभा चुनाव में बड़ा उलटफेर करेगी, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया, तब 2018 सपा के लिए कुछ खुशियां लेकर आया। दो करारी हारों के बाद बीते वर्ष तीन लोकसभा सीटों पर हुए उप−चुनावों में अखिलेश ने राष्ट्रीय लोकदल और बसपा के साथ जुगलबंदी करके तीनों ही सीटों पर जीत का परचम फहराया तो भाजपा के होश उड़ गए। उसे लोकसभा चुनाव की चिंता सताने लगी।

उधर, अखिलेश ने 2017 में राहुल का पकड़ा हाथ छोड़कर बहनजी की पार्टी से गठबंधन कर लिया। दोनों आधी−आधी सीटों पर लड़े। माहौल ऐसा बनाया गया, मानो यह गठबंधन बीजेपी का सफाया कर देगा। उधर, कांग्रेस महासचिव प्रियंका वाड्रा के यूपी के चुनावी मैदान में कूदने से यह अटकलें लगने लगी थीं कि कांग्रेस जीते भले नहीं, लेकिन भाजपा को नुकसान जरूर पहुंचाएगी। परंतु दूसरी तरफ बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह एक ही रट लगाए थे कि हम 73 से एक सीट अधिक जीत सकते हैं कम नहीं। बदली सियासी परिस्थितियों में अमित शाह का यह दावा उनका विश्वास कम अंहकार ज्यादा लग रहा था, लेकिन जब नतीजे आए तो सब चौंक गए। बीजेपी को भले 74 सीटें नहीं मिलीं, लेकिन 64 सीटों पर मिली कामयाबी भी छोटी नहीं थी। वहीं गठबंधन पूरी तरह से ध्वस्त दिखाई दिया। खासकर समाजवादी पार्टी के लिए मायावती से गठबंधन का प्रयोग पूरी तरह से फ्लाप शो साबित हुआ।
लोकसभा चुनाव में मोदी मैजिक ने सबको किनारे कर दिया। लगातार मिली तीन करारी हार के बाद अखिलेश की सियासी काबलियत पर 'घर' के भीतर और 'बाहर' दोनों जगह से उंगलियां उठने लगी हैं। और तो और जिन चाचा रामगोपाल यादव के चलते टीपू (अखिलेश) ने पिता मुलायम सिंह और चाचा शिवपाल यादव तक से बगावत की थी, वह रामगोपाल भी आरोप लगा रहे हैं कि पार्टी में टिकटों का बंटवारा ठीक से नहीं हुआ। बसपा से गठबंधन को लेकर कई मौकों पर नाराजगी जता चुके सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव ने भी लखनऊ में समाजवादी पार्टी कार्यालय पहुंच कर हार की समीक्षा की और लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के लिए पार्टी पदाधिकारियों को जिम्मेदार ठहराते हुए जमकर फटकार लगाई। मुलायम ने कहा कि पदाधिकारी लापरवाह रहे और जनता की नब्ज नहीं पकड़ सके। मुलायम के अधिकतर सवालों पर पार्टी के नेता बगलें झांकते रहे। एक−दो लोगों ने हार के कुछ तर्क गिनाए भी तो उन्हें खरी−खरी सुननी पड़ी।
 
मुलायम सबसे अधिक दुखी इस बात से थे कि उनके ही गढ़ में उनके परिवार के लोगों को हार झेलनी पड़ी। कन्नौज में डिंपल यादव, फिरोजाबाद में अक्षय यादव और बदायूं में धर्मेंद्र यादव की हार से मुलायम काफी आहत बताए जा रहे हैं। वह इसे समाजवादी पार्टी के लिए शुभ संकेत नहीं मानते हैं। इसीलिये वह पार्टी नेताओं को उलाहना दे रहे थे कि तुम लोग तो घर की सीटें भी नहीं बचा पाए। बताते हैं कि मुलायम की नाराजगी केवल नतीजों के लिए नहीं, गठबंधन को लेकर भी थी। इस मौके पर गठबंधन पर भी सवाल खड़े हुए। कुछ नेताओं का आरोप था कि हार की बुनियाद बसपा से गठबंधन में सीटों के बंटवारे के समय से ही पड़ गई थी। सपा नेताओं का कहना था कि चुनाव में जिन सीटों पर जीतने की उम्मीद थी, उनमें से कई सीटें बंटवारे में बसपा के पास चली गईं, जबकि सपा के खाते में ऐसी सीटें आ गईं, जहां पार्टी ने कभी जीत हासिल नहीं की थी।
सपा को मिली करारी शिकस्त के बाद पार्टी कार्यालय पहुँच कर मुलायम ने पार्टी के नेताओं को तो खूब खरी−खोटी सुनाई, लेकिन उन्होंने बैठक के दौरान अखिलेश की क्लास के खिलाफ कोई तीखी टिप्पणी नहीं की। परंतु मुलायम का उदास मन बता रहा था कि कहीं न कहीं मुलायम को भाई शिवपाल के सहारे की भी कमी महसूस हो रही थी, जिनके सहारे मुलायम ने कई बार सत्ता की सीढ़ियां चढ़ी थीं, लेकिन इन चुनावों में वह समाजवादी पार्टी के लिए मुसीबत का सबब बने रहे। शिवपाल के चलते अखिलेश की छवि काफी दागदार हुई। एक तरह से शिवपाल से अखिलेश की नफरत और दूसरी तरफ बसपा सुप्रीमो मायावती से दोस्ती ने भी समाजवादियों का मनोबल तोड़ा। नाम न छापने की शर्त पर कुछ सपा नेता कहते हैं जब अखिलेश मायावती और अजित सिंह से हाथ मिला सकते थे तो शिवपाल तो घर के सदस्य थे, उनके साथ इतना बैर ठीक नहीं था। इसी प्रकार मुलायम की इच्छा जानने के बाद भी अखिलेश का अपने छोटे भाई प्रतीक की पत्नी अपर्णा यादव को लोकसभा चुनाव के लिए टिकट नहीं दिया जाना भी कुछ समाजवादियों को रास नहीं आया।
 
उधर, शिवपाल यादव अपने भतीजे अखिलेश की अगुवाई वाली समाजवादी पार्टी को नुकसान पहुंचाने के लिए कमर कसे नजर आए। उन्होंने प्रत्यक्ष−अप्रत्यक्ष तौर पर सपा को नुकसान भी पहुंचाया। इसी के चलते रामगोपाल यादव के बेटे अक्षय यादव को हार का सामना करना पड़ा। अक्षय के खिलाफ शिवपाल यादव भी चुनाव लड़े थे। अक्षय यादव को कुल 4,65,686 वोट मिले थे और भाजपा के डॉ. चंद्रसेन जादौन को 4,94,050 वोट मिले थे। इस तरह से अक्षय यादव 28,364 वोट से चुनाव हार गए। वहीं, शिवपाल यादव को 91,651 वोट मिले। अगर यह वोट अक्षय को मिलता तो यहां की तस्वीर कुछ और होती।
 

  
कहा यह जा रहा है कि समाजवादी पार्टी से निकल कर अपनी खुद की पार्टी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी बनाकार फिरोजाबाद से चुनाव लड़ने वाले मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई शिवपाल को अपनी हार का गम कम बल्कि अक्षय यादव के फिरोजाबाद पर जीत नहीं दर्ज कर पाने की खुशी ज्यादा है। यह इसलिए कहा जा रहा है, क्योंकि समाजवादी पार्टी से बाहर करवाने में अक्षय के पिता रामगोपाल का बड़ा हाथ रहा। रामगोपाल को शिवपाल कत्तई पसंद नहीं हैं। इसका कारण कुछ भी हो सकता है, लेकिन बताया जाता है कि शिवपाल के खिलाफ अखिलेश को भड़काने में रामगोपाल ने बड़ी भूमिका निभाई है। जिसकी वजह से शिवपाल भी अब रामगोपाल को देखना पसंद नहीं करते हैं।
 
खैर, सियासत हमेशा 'बलि' मांगती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि 'बलि' के डर से लोग दुबक कर बैठ जाएं। अखिलेश भी धीरे−धीरे हार से उबर रहे हैं। सपा सूत्रों के अनुसार लोकसभा चुनाव में हार के बाद अखिलेश यादव पार्टी को फिर उसी तरह सभी वर्गों का संतुलन साधकर मजबूत करना चाहते हैं, जैसा कभी मुलायम सिंह यादव के समय पार्टी हुआ करती थी। पार्टी के पास तब हर वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले चेहरे थे और इन चेहरों की समाज में भी स्वीकार्यता थी। अखिलेश ने इस चुनाव में हार के लिए भी पार्टी के पुराने नेताओं से फीडबैक लिया है।
 
सपा में अब संगठनात्मक तौर पर बड़े बदलाव की तैयारी की जा रही है। सबसे पहले बड़ा कदम उठाते हुए अखिलेश ने समाजवादी पार्टी के मीडिया पैनल को भंग कर दिया है। आगे प्रदेश अध्यक्ष से लेकर जिलाध्यक्षों तक को हटाने व फ्रंटल संगठनों को भंग किए जाने की चर्चा तेजी से चल रही है। बताया जा रहा है कि समाजवादी युवजन सभा, समाजवादी छात्रसभा, समाजवादी लोहिया वाहिनी और मुलायम सिंह यूथ ब्रिगेड के साथ ही संगठन की कई इकाइयों का नये सिरे से गठन करने पर विचार शुरू हो रहा है। पार्टी कार्यालय में अखिलेश यादव द्वारा पूर्व मंत्री ओमप्रकाश सिंह को बुलाने और नया दायित्व सौंपे जाने की भी सुगबुगाहट है। अखिलेश द्वारा रिपोर्ट मांगे जाने के बाद कई लोगों पर कार्रवाई होना तय माना जा रहा है।
 
लब्बोलुआब यह है कि अखिलेश को हार के लिए अपनी पार्टी के अन्य नेताओं और कार्यकर्ताओं पर उंगली उठाने से पूर्व अपने गिरेबां में भी झांक कर देखना होगा। अखिलेश ने भी चुनाव में गलतियां कम नहीं की हैं। आजम खान जैसे उनके नेताओं ने भी महिलाओं की मर्यादा को तार−तार किया, लेकिन अखिलेश तुष्टिकरण की सियासत के चलते मौन साधे रहे।
 
-अजय कुमार
 

रहना है हर खबर से अपडेट तो तुरंत डाउनलोड करें प्रभासाक्षी एंड्रॉयड ऐप


Disclaimer: The views expressed here are solely those of the author in his/her private capacity and do not necessarily reflect the opinions, beliefs and viewpoints of Prabhasakshi and do not in any way represent the views of Prabhasakshi.