म्यूजिकल चेयर खेल रही है कांग्रेस, माँ ने बेटे को कुर्सी दी, बेटे ने वापस माँ को दे दी

म्यूजिकल चेयर खेल रही है कांग्रेस, माँ ने बेटे को कुर्सी दी, बेटे ने वापस माँ को दे दी

संतोष पाठक | Aug 12 2019 3:23PM
राहुल गांधी के इस्तीफे से उपजे असमंजस की स्थिति के बीच सोनिया गांधी ने एक बार फिर से आधिकारिक रूप से कांग्रेस की कमान संभाल ली है। मंथन के लगातार चले दौर और कई नामों में कयास के बीच हाल ही में फिर से सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर पार्टी की कमान सौंप दी गई है, हालांकि राहुल गांधी के अध्यक्षीय कार्यकाल के दौरान भी कांग्रेस पार्टी में सोनिया गांधी का महत्व उतना ही ज्यादा था जितना अब हो गया है। इस बात पर किसी को कोई शंका नहीं है। सोनिया गांधी के फिर से कमान संभालने की घटना पर बीजेपी समेत अन्य कई दल तो चुटकी ले ही रहे हैं, सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर तरह-तरह के कटाक्ष किये जा रहे हैं। 
 
हालांकि इन सबके बीच कांग्रेस का आम कार्यकर्ता उत्साहित नजर आने लगा है। उन्हें यह लग रहा है कि सोनिया गांधी कांग्रेस के लिए फिर से चमत्कार कर सकती हैं। कांग्रेस के लोग 1998 को याद कर रहे हैं। उस समय भी कांग्रेस की हालत खस्ता थी। लोकसभा चुनावों में उस समय की बड़ी हार का सामना कर चुकी कांग्रेस पस्त थी। उस समय तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी को जबरदस्ती अध्यक्ष पद से हटा कर सोनिया गांधी को कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने अध्यक्ष बनाया था। 
सोनिया गांधी का पिछला कार्यकाल 
 
1998 में अध्यक्ष बनते ही सोनिया गांधी ने तेज़ी से काम करना शुरू कर दिया। पार्टी छोड़ कर जाने वाले नेताओं के लिए घर वापसी अभियान चलाया। अन्य दलों के नेताओं के साथ बेहतर तालमेल स्थापित किया। उसके बाद कई राज्यों में कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की। कुछ महीनों बाद ही ऐसी राजनीतिक घेरेबंदी की कि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार एक वोट के अंतर से गिर गई। कारगिल जीत के माहौल में 1999 में हुए चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी फिर से जीत कर प्रधानमंत्री जरूर बन गए लेकिन सोनिया गांधी की लगातार मेहनत और राजनीतिक सूझबूझ की वजह से 2004 में बीजेपी से महज 7 लोकसभा सीटें ज्यादा जीत कर सोनिया गांधी ने केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की सरकार बनवा कर ही दम लिया। 2009 में दोबारा यूपीए की सरकार बनवा कर सोनिया गांधी ने अपनी राजनीतिक क्षमता का लोहा मनवाया। उस समय कांग्रेस के अंदर ही नहीं बल्कि यूपीए के तमाम सहयोगी दलों के बीच भी सोनिया गांधी का एक अलग ही राजनीतिक रुतबा हुआ करता था। 
 
क्या 2019 भी बन सकता है 1998 ? 
 
ऐसे में भले ही कांग्रेस को सोनिया गांधी से 1998 की तरह चमत्कार की उम्मीद हो लेकिन सच्चाई यही है कि 2019 की चुनौती 1998 से कहीं बड़ी है। 1998 में कांग्रेस के पास जमीनी नेताओं की भरमार थी। उस समय नेताओं को सिर्फ एकजुट कर लड़ने के लिए प्रेरित करना था। उस समय भले ही कांग्रेस पार्टी कमजोर थी लेकिन पार्टी में शरद पवार, माधव राव सिंधिया, नारायण दत्त तिवारी, राजेश पायलट, प्रणब मुखर्जी, अर्जुन सिंह, विलासराव देशमुख, अशोक गहलोत, शीला दीक्षित, वी.एन. गाडगिल, कमलनाथ, प्रियरंजन दास मुंशी, जयपाल रेड्डी, शिवराज पाटिल, पी.ए. संगमा जैसे अनुभवी, वरिष्ठ, जमीन से जुड़े जुझारू नेताओं की भरमार थी। आज इनमें से कई दुनिया में नहीं है तो कई सक्रिय राजनीति से दूर हैं। कुछ कांग्रेस से अलग हट कर अपनी पार्टी बना चुके हैं और जो बचे भी हैं वो हिम्मत हार चुके हैं। आज कांग्रेस को जमीन से जुड़े अनुभवी मॉस लीडर की किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। 
 
बीजेपी का सदस्यता अभियान
 
आज कांग्रेस की हालत इतनी खस्ता है कि उसके नेता एक-एक करके पार्टी छोड़ते जा रहे हैं। जिनकी सांसदी और विधायकी का कार्यकाल बचा भी है वो भी विधायक, सांसद पद से इस्तीफा देकर बीजेपी जॉइन कर रहे हैं। कहा तो यहां तक जा रहा है कि कांग्रेस में लगातार ऐसे नेताओं की संख्या बढ़ती जा रही है जो बीजेपी के दरवाजे पर लाइन लगा कर खड़े हैं। कांग्रेस छोड़ कर जाने वाले ज्यादातर नेताओं की शिकायत आलाकमान के रवैये को लेकर ही रही है। ज्यादातर की शिकायत रही है कि राहुल गांधी उनसे मिलते नहीं हैं, उनकी बात सुनते नहीं हैं। पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं का विश्वास अपने ही आलाकमान पर खत्म हो जाये तो स्थिति वैसी ही विकट हो जाती है जैसे कि कांग्रेस की हो गई है। इसलिए पार्टी में भगदड़ की स्थिति मची हुई है और फिलहाल सोनिया गांधी के सामने सबसे बड़ी चुनौती नेताओं को कांग्रेस में रोकना है। भगदड़ को रोकना है। 
विधानसभा चुनाव से ज्यादा जरूरी है अस्तित्व बचाना
 
आने वाले महीनों में महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और दिल्ली में विधानसभा चुनाव होने हैं। एक जमाना था जब इनमें से तीन राज्यों में कांग्रेस की तूती बोला करती थी लेकिन आज यहां प्रदेश कांग्रेस में भगदड़ की स्थिति बनी हुई है। इसलिए यह कहना पड़ रहा है कि चुनाव जीतने से ज्यादा बड़ी चुनौती इस समय सोनिया गांधी के सामने कांग्रेस पार्टी को बचाना है। सोनिया की यह चुनौती इसलिए भी बड़ी बन जाती है कि पार्टी के 50 वर्ष तक के नेताओं को कांग्रेस में अपना और अपने बच्चों का राजनीतिक भविष्य अंधकारमय नजर आ रहा है। गांधी परिवार का भविष्य कहे जाने वाले राहुल गांधी भी लगातार हार से त्रस्त होकर हथियार डाल चुके हैं। ऐसा उदाहरण शायद राजनीति में कभी भी देखने को नहीं मिला होगा कि मां ने अपने बेटे को विरासत सौंपी हो और कुछ सालों बाद बेटे ने फिर से सिंहासन मां को लौटा दिया हो।
 
-संतोष पाठक
 

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