मुस्लिम वोटों पर कब्जे के लिए और क्या-क्या करेंगे अखिलेश और मायावती

मुस्लिम वोटों पर कब्जे के लिए और क्या-क्या करेंगे अखिलेश और मायावती

अजय कुमार | Aug 5 2019 12:09PM
उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोटों के लिए सपा−बसपा के बीच एक बार फिर से सियासी द्वंद्व शुरू हो गया है। मोदी के हिन्दुत्व के सामने कुछ समय के लिए भले मायावती−अखिलेश की मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति पस्त पड़ गई थी, लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद यूपी में राजनैतिक हालात फिर से बदल गए हैं। बस, फर्क इतना है पहले समाजवादी पार्टी मुस्लिम वोट बैंक पर अपनी बपौती समझती थी, परंतु आम चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने मुस्लिम वोटों में सेंधमारी करके जता दिया है कि वह भी तुष्टिकरण की सियासत के मंच पर किसी दूसरे दल से पीछे नहीं है। बसपा के दस में से तीन मुस्लिम प्रत्याशियों के लोकसभा चुनाव जीतने से बसपा सुप्रीमो गद्गद हैं। मुस्लिम वोटों पर दावेदारी मजबूत होते ही मायावती ने अखिलेश यादव के साथ कुछ माह पुराने गठबंधन के धर्म को भूलकर उन्हें आंखें दिखाना शुरू कर दिया था। यह सिलसिला सपा−बसपा का गठबंधन टूटने के बाद और तेज हो गया। अब बसपा−सपा, दोनों मुस्लिम वोटों के लिए खुलकर आपस में रस्साकशी कर रहे हैं। वैसे, यह सिलसिला पुराना है। मुस्लिमों को लुभाने के लिए मायावती−अखिलेश समय−समय पर आरएसएस, बीजेपी, मोदी और योगी सरकार को आंखें दिखाते रहते हैं। यह और बात है कि तीन तलाक पर जब राज्यसभा में वोटिंग होती है तो दोनों दलों के सांसद वहां से नदारद हो जाते हैं।
ऐसा करना बसपा−सपा की मजबूरी भी है। दोनों दलों के आका जानते और समझते हैं कि मुसलमानों को अपने पाले में खींचे बिना उनकी सियासत कभी परवान नहीं चढ़ सकती है। क्योंकि मायावती को दलित−मुस्लिम तो सपा को यादव−मुस्लिम समीकरण हमेशा रास आता रहा है। कांग्रेस के पतन के बाद मुसलमान भी इन दोनों दलों के लिए ही वोटिंग करते रहे हैं। हाँ, बसपा के मुकाबले सपा को मुलसमानों का साथ ज्यादा मिलता रहा। यह सिलसिला मुलायम की जगह अखिलेश के समाजवादी पार्टी की कमान संभालने के बाद जरूर थोड़ा कमजोर होता दिखाई दिया। इसकी एक वजह मोदी सरकार भी है। अब मोदी के नाम का भय मुसलमानों को दिखाया जाना आसान नहीं है। इसकी वजह है मोदी सरकार रूढ़िवादी और कट्टरपंथी मुस्लिमों की जगह उदारवादी और प्रगतिशील मुस्लिम समाज को साथ लेकर चल रही है और उनके हित में फैसले ले रही है। मोदी एक हाथ में कुरान तो दूसरे में कम्प्यूटर की बात करते हैं। मोदी सरकार तीन तलाक जैसी बुराइयों के खिलाफ कानून बनाती है तो मदरसों का स्तर सुधारने के लिए कड़े कदम उठाने से भी उसे परहेज नहीं है। केन्द्र की मोदी सरकार जिस तरह से मुस्लिमों के हित में फैसले ले रही है और सबका विश्वास जीतने की बात करती है, उसका नतीजा यह कि अब मुसलमानों को बड़ा धड़ा सिर्फ बीजेपी प्रत्याशी को हराने के लिए वोट नहीं करता है। अब मुसलमान सपा−बसपा या कांग्रेस को वोट देने से पहले अपना भला देखता है। इसका कारण है मोदी सरकार समाज के हित के लिए जो भी योजनाएं ला रही है, उसका फायदा जितना गैर मुस्लिमों को मिल रहा है, उतना ही मुसलमान उठा रहे हैं। चाहे प्रधानमंत्री आवास योजना हो या फिर उज्ज्वला योजना अथवा आयुष्मान भारत के तह पांच लाख रुपए तक का मुफ्त इलाज जैसे अनेक कार्यक्रम, मुसलमान सबका भरपूर फायदा उठा रहे हैं। यह फायदा उन्हें किसी उस सरकार में नहीं मिला, जिसके नेता अपने आप को मुसलमानों का रहनुमा समझते थे।
    
खैर, अगर कोई शेर आदमखोर हो जाए तो फिर जैसे उसे आदमी के मांस के अलावा और कोई मांस अच्छा नहीं लगता है। ठीक वैसे ही मुस्लिम वोटों के लिए सपा−बसपा की हर समय 'लार' टपकती रहती है। अगर ऐसा न होता तो सपा प्रमुख अखिलेश यादव उन्नाव कांड के पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए शक्ति प्रदर्शन करते, मगर उन्होंने मुस्लिम वोट बैंक की सियासत के चलते उन्नाव कांड की जगह अपने नेताओं−कार्यकर्ताओं के माध्यम से मोहम्मद आजम खां के कथित उत्पीड़न को हवा देना ज्यादा जरूरी समझा। सबसे दुख की बात यह है कि आजम खान जौहर विश्वविद्यालय के नाम पर अपने भतीजे अखिलेश की सरकार के समय खूब काला−सफेद करते रहे और उनका भतीजा अखिलेश सब कुछ देखता रहा। अब जब आजम के पाप का घड़ा फूटा तो अखिलेश ने सच स्वीकारने की बजाए आजम के काले कारनामों को मुस्लिम स्वाभिमान से जोड़ दिया। रामपुर कूच के बहाने शक्ति प्रदर्शन कर आगे और भी बड़े आंदोलन के संकेत भी दिए।
आजम के खिलाफ लगातार दर्ज हो रहे मुकदमों के बीच उनके बचाव में अखिलेश के सामने आने का सिर्फ और सिर्फ एक ही मकसद है। किसी भी तरह से मुस्लिमों को अपने पाले में खींच कर लाया जा सके। अगर ऐसा न होता तो अखिलेश उस समय भी आजम का बचाव नहीं करते जब संसद में लोकसभा अध्यक्ष की कुर्सी पर पीठासीन एक महिला सांसद के खिलाफ आजम ने घटिया दर्जे की टिप्पणी की थी, जिसे संसद की कार्रवाई तक से निकाल दिया गया था। अखिलेश यादव जब आजम खान के साथ खड़े दिखाई देते हैं और तीन तलाक पर वोटिंग के समय सदन उनके सांसद सदन से बाहर चले जाते हैं तो अखिलेश का दोहरा चरित्र उजागर हो जाता है।
 
बहरहाल, समाजवादी पार्टी ने रामपुर में जो शक्ति प्रदर्शन किया उसका एक फायदा यह जरूर हुआ कि जो सपा नेता सड़क पर उतरना भूल चुके थे, उन्हें पुराने दिनों की याद आ गई। सब जानते हैं कि मुलायम सिंह यादव की पूरी सियासत ही धरना−प्रदर्शन के सहारे आगे बढ़ी थी। लेकिन जब से अखिलेश ने पार्टी की कमान संभाली तब से सपा के नेता/कार्यकर्ता अपने पुराने मिजाज में कभी नहीं दिखाई दिए। 2017 के विधान सभा और हाल ही में सम्पन्न आम चुनाव में करारी हार के बाद यह पहला मौका था, जब सपा आक्रामक अंदाज में सड़कों पर उतरी। लखनऊ से लेकर रामपुर तक में उसने अपनी ताकत दिखाई।
 
सूत्र बताते हैं कि मुस्लिमों का एक बड़ा खेमा तीन तलाक के मुद्दे पर सपा नेतृत्व के रुख से नाराज चल रहा है। उसे लगता है कि अखिलेश ने राज्यसभा में सरकार की अप्रत्यक्ष मदद की थी। वर्ना सपा सांसद वोटिंग के समय उपस्थित रहते। अखिलेश तीन तलाक का विरोध करने में क्यों पीछे रहे, इसकी वजह कई हो सकती है। अखिलेश के खिलाफ भी कई जांचें चल रही हैं।
 
दरअसल, बसपा से गठबंधन टूटने के बाद सपा को मुस्लिमों को अपने साथ जोड़कर रखने की चिंता सता रही है। मायावती द्वारा मुस्लिमों को लुभाने की सभी कोशिशें की जा रही हैं। दलित−मुस्लिम गठजोड़ चुनाव जीतने का कारगर फार्मूला माना जाता है। सपा के ही कुछ मुस्लिम नेताओं को लगता है कि उनकी पार्टी मुस्लिमों के मुद्दों पर बसपा सुप्रीमो मायावती से पिछड़ रही है। अगर यह सिलसिला थमा नहीं तो समाजवादी पार्टी हाशिये पर पहुंच सकती है।
 
-अजय कुमार
 

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