सादगी, सरलता और दानवीरता के प्रतीक हैं अजीम प्रेमजी

सादगी, सरलता और दानवीरता के प्रतीक हैं अजीम प्रेमजी

अंकित सिंह | Jun 7 2019 4:28PM

किसी ने सच ही कहा है, सपना देखना हो तो बड़ा देखो पर शुरूआत हमेशा छोटे से करो। ऐसा ही कुछ अजीम प्रेमजी ने कर दिखाया है। फिलहाल वह सुर्खियों में इसलिए हैं क्योकि उन्होंने अपने 53 साल के शानदार बिजनेस सफर को छोड़ दिया है और अपने कारोबार की कमान अपने बेटे रिशद को सौंप दी है। जिसमें जुनून हो, लगन हो वह अपना रास्ता खुद ही बना लेता है। 24 जुलाई 1945 को मुंबई के साधारण कारोबारी मोहम्मद हाशिम प्रेमजी के परिवार में जन्मे अजीम प्रेमजी शुरू से दूरदर्शी रहे हैं। जानकार बताते हैं कि इनके पिता मोहम्मद अली जिन्नाह के भी करीबी थे और जब भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हुआ था तब जिन्ना ने इनके पिता को पाकिस्तान में बसने और वित्त मंत्री बनने का प्रस्ताव दिया था। लेकिन उस प्रताव को ठुकराकर इनके पिता ने भारत में ही बसने का फैसला किया था। तब इनके पिता वनस्पति तेल और साबुन का व्यपार करत थे। जिस वक्त अजीम प्रेमजी के पिता का निधन हुआ उस वक्त वह महज 21 वर्ष के थे और इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे। परिवार वालों के मना करने के बाद भी उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ पिता के व्यपार को आगे बढ़ाने का फैसला किया। 

समय को भांपते हुए 70 के दशक में अपने तेल और साबुन के कारोबार से हटकर प्रेमजी ने सॉफ्टवेयर की दुनिया की तरफ रुख किया और धीरे-धीरे अपने कारोबार को ऊंचाईयों पर पहुंचाया। 53 साल के सफर में उन्होंने अपनी कंपनी विप्रो के कारोबार को 12 हजार गुना बढ़कर 83 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचा दिया। 1980 में स्थापित हुई विप्रो वर्तमान में भारत की तीसरी सबसे बड़ी आईटी कंपनी है। विप्रो की ओर से जारी एक विज्ञप्ति में कहा गया है कि अजीम प्रेमजी 30 जुलाई को कार्यकारी चेयरमैन का पद छोड़ देंगे पर कंपनी के निदेशक मंडल में बने रहेंगे। उनके बेटे रिशद मुख्य कार्यकारी अधिकारी के तौर पर कार्यभार संभालेंगे। मुकेश अंबानी के बाद अजीम प्रेमजी देश के दूसरे सबसे रईस व्यक्ति भी हैं। उनकी कुल संपत्ति अभी 21 बिलियन डॉलर है। उन्होंने 2001 में अजीम प्रेमजी फाउंडेशन की स्थापना की और CSR के जरिए कई समाजिक कार्यों का निर्वहन करते हैं। प्रेमजी आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटका में बच्चों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लइे कई योजनाओं को भी संचालित करते है। प्रेमजी ने लगभग एक लाख 45 हजार करोड़ रुपये परमार्थ कार्यों के लिए दान में दे चुके हैं।  
अपनी इमानदारी और परिश्रम की बदौलत प्रेमजी ने दुनिया की तमाम शोहरत कमाई पर वह हमेशा विनम्र रहें। उनकी सादगी उन्हें और भी चमत्कारी व्यक्ति बनाती है। अपने सिद्धान्तों पर कायम रहने वाले प्रेमजी परोपकारी स्वभाव के हैं और किसी के सुख-दुख में शामिल होना उनकी मेहनतकश जिंदगी का हिस्सा है। अपने काम को खुद करना, सहयोगियों के साथ मिलनसार रहना और अपने यहां काम कर रहे लोगों के लिए मददगार रहना इनकी जिंदगी के कुछ अहम हिस्से हैं। कम बोलना पर दूसरे की काबलियत को निखारना इन्हें खास बनाती है। दिखावे और आडंबर से दूर रहकर अपने काम को करते रहना इनकी खासियत है। प्रतिद्वन्दिता को पीछे रख इंफोसिस प्रमुख एनआर नारायण मूर्ति के साथ इनकी दोस्ती उन्हें और भी महान बनाती है। ऐसा माना जा रहा है कि कंपनी से अगल होने के बाद प्रेमजी परिवार के साथ ज्यादा वक्त बिताएंगे पर यह देखना होगा कि खुद को कंपनी से कितना दूर रख पाते है। कई अहम पुरस्कारों से सम्मानित प्रेमजी आज इस देश के हर युवा के लिए प्रेरणा हैं। भारत में आईटी के क्षेत्र में क्रांति लाने का श्रेय भी अजीम प्रेमजी को जाता है। 
 

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