दिल्ली में बंदर (व्यंग्य)

दिल्ली में बंदर (व्यंग्य)

संतोष उत्सुक | Aug 2 2019 5:13PM
इंसान अनुभवी प्रबन्धक है। बेहतर इलाज के लिए, अपने ‘पूर्वजों’ को देश की राजधानी स्थित, प्रतिष्ठित हस्पताल में भिजवा दिया। कई राज्यों की सरकारें यहां तक कि बड़ी सरकार भी उनके इलाज में फेल हो चुकी है। उनकी नसबंदी, घेरेबंदी की, हज़ारों अनुभवी भी ज़्यादा कुछ न कर सके। बंदरों को लगा होगा भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में बड़ी से बड़ी बीमारी का शर्तिया इलाज होता है। वे डाक्टर्स, स्टाफ व मरीजों से भी गुज़ारिश करने लगे लेकिन इंसानी बीमारियों के माहिर डाक्टर उनकी बात समझ नहीं सके। उन्होंने एक सप्ताह के भीतर तीन महिला डाक्टर्स को ज़ख्मी कर समझाने की कोशिश की लेकिन वे भी नहीं समझ पाई। इस बीच यह भी पता चला कि हस्पताल में रेबीज के इंजेक्शन नहीं हैं। बंदरियों को लगा होगा डाक्टर महिलाएं हमारे बच्चों का दर्द ज़रूर समझेंगी। वैसे तो आज अपने बच्चों का दर्द सहने की फुर्सत भी मनोरंजन हो गई है। काम मुश्किल रहा, जब इतने दशकों में धर्माचार्य, वनाचार्य, नेता, मंत्री, मुख्यमंत्री नहीं समझ सके तो आम आदमी की क्या बिसात। 
भूखे बंदरों ने सोचा होगा दिल्ली दिलवालों की है उनके खाने पीने का बढ़िया इंतजाम हो जाएगा, लेकिन वे जानवर ठहरे उन्हें दिल्लीवासियों द्वारा खाने पीने के तौर तरीकों का क्या पता। बचने की इंसानी प्रवृति ने प्रशासन को पत्र भेजा कि बंदरों से बचाएं। राजधानी के किसी एक अनुभवी को भी यह समझ नहीं आया कि हमने बंदरों की रिहाइश उजाड़ कर वहां अपना मकान बना लिया। इंसान हैं न, उन्हें कैसे समझ आता कि ‘पूर्वज’ आएंगे तो यहीं आकर रहेंगे न। बंदरों के काटने का मुआवजा मांगा जा रहा है यह मांग उचित है लेकिन बंदर भी अपने घर उजाड़ने का मुआवजा मांगने दिल्ली गए हैं, लेकिन गलत जगह पहुँच गए। संभवत उन्हें संसद जाना चाहिए। उनके पास खाने के लिए नहीं है, भूख लगेगी तो छीन कर ही खाएंगे। हम एक दूसरे के दुश्मन हो गए हैं तो लड़ेंगे ही लेकिन इतने बड़े अस्पताल में इंसान को मरने नहीं देते, बंदरों को कैसे मारेंगे। दिल्ली में तो डराने के लिए लंगूर भी नहीं मिलते। बंदर भगाने वालों को रखकर कब तक असलियत को दूर भगाया जा सकता है। बंदर क्या कहना चाहते हैं आदमी सुनना नहीं चाहता। बंदरों को लग रहा है अब आदमी भी बंदर होता जा रहा है। अपने लिए कुछ नहीं कर पा रहा उनके लिए क्या करेगा। हमने उन्हें उजाड़ने के सारे प्रयास कर लिए अब तो उन्हें बसाना ही आखिरी और सही उपाय रहेगा। जिन लोगों ने उन्हें न मारने के कानून बनाए निश्चय ही वे पशु प्रेमी होंगे। उनके मानवतावादी दृष्टिकोण ने भी तो बंदरों को चैन से नहीं रहने दिया। मरने की सीधी सज़ा सुना दी होती तो सुख से मरते। लगता है बंदर समझ गए हैं कि उनके पुनर्वास के लिए जंगल रोपने का नाटक कई दशकों से हो रहा है। नाटक, नारों, प्रस्तावों, जुलूसों, बैठकों व कागज़ी परियोजनाओं के वृक्ष अभी तक ठीक से नहीं उगे। 
प्रशासन को चाहिए अब बिना कानून बनाए हर परिवार को बंदर बांट दे। यह काम पंचायतें व नगरपालिकाएं बेहतर कर सकती हैं। उनके पास सभी मकानों व परिवारों का पूरा ब्योरा होता है। हर सार्वजनिक नुमायंदा  इस मामले में संजीदगी से काम करे। यह मकान में रहने वाले इंसान की ज़िम्मेदारी होगी कि वह ‘पूर्वजों’ के साथ मिलजुलकर रहे। इस बहाने हम सभी, जो पशुपक्षी प्रेम की बातें ही बातें  करते रहते हैं उनका वास्तविक टैस्ट भी हो जाएगा। समाज के वैभवशाली, प्रभावशाली, शक्तिशाली, रसूखशाली और सभी किस्म की ताक़तें रखने वालों को ज़्यादा मात्रा में बंदर दिए जाएं। इस बहाने उनका वन्य जीव सेवा, का सपना ज्यादा व्यवहारिक ढंग से पूरा होगा। करोड़ों रूपए की राशि प्रशासन ने आज तक पूर्वजों के नाम पर बांटी है, सरकार चाहे तो भविष्य में काफी कम खर्च कर, पशु चिकित्सालयों में सुविधाएं उपलब्ध करवा अपने दायित्व से मुक्त हो सकती है। 
 
पिछले दिनों एक मोरनी भी अपने बच्चों के साथ संसद भवन परिसर में देखी गई है। वह भी ज़रूर फरियाद लेकर आई होगी खास लोगों के पास क्यूंकि आम लोग तो कुछ करने लायक नहीं होते। बंदर, जो आक्रामक होते जा रहे हैं उनकी भाषा कोई नहीं समझ रहा, बेचारी शांत मोरनी की कौन समझेगा। हमें पितृ दोष से मुक्त रहना चाहिए।   
 
- संतोष उत्सुक

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