साहित्य जगत

प्रदूषण मुक्ति (व्यंग्य)

By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Sep 10 2018 4:04PM

पिछले हफ्ते दिल्ली गया, तो खुला मौसम पाकर शाम को पड़ोस के पार्क में चला गया। मेरे सामने वाली बैंच पर बैठे दो बुजुर्ग बड़ी रोचक चर्चा कर रहे थे। उनके सफेद बाल और हाथ की छड़ी उनकी आयु बिना कहे ही बता रही थी।

- क्या बात है शर्मा जी, आज कई दिन बाद आये हैं ?

- हां वर्मा जी, पुराने दांतों का सेट ढीला पड़ गया था। कई दांत घिस भी गये थे। सो नये दांत बनवाने के लिए कई दिन लगातार मैट्रो अस्पताल में जाना पड़ा।

- लेकिन आप वहां क्यों गये; हमारे मोहल्ले के डाॅक्टर रोहन तो बड़े प्रसिद्ध हैं। दूर-दूर से लोग दांत बनवाने यहां आते हैं ?

- हां। मैंने भी पिछली बार दांत उनसे ही बनवाये थे; पर अब वहां जाता, तो दस हजार रु. भी तो लगते ?

- तो मैट्रो अस्पताल में पैसे नहीं लगे ?

- लगे तो होंगे; पर मेरी जेब से खर्च नहीं हुए।

- क्या मतलब ?

- वर्मा जी, मेरा बेटा राजीव जिस कम्पनी में काम करता है, वह उसे और उसके परिवार वालों को निःशुल्क चिकित्सा सुविधा देती है। उनका मैट्रो अस्पताल से इस बारे में अनुबंध है।

- लेकिन वह चिकित्सालय तो 25 कि.मी. दूर है। आने-जाने में ही काफी समय लग जाता होगा ?

- वर्मा जी, बुजुर्गों के पास समय की कोई कमी नहीं होती। मुझे तो जब भी जाना होता था, मैं राजीव को बता देता था। उसकी कम्पनी वाले टैक्सी भेज देते थे। मेरी पत्नी भी साथ में चली जाती थी। इस बहाने उसका भी कुछ घूमना-फिरना हो जाता था। लगे हाथ उसने एक-दो जांच भी करा लीं।

- लेकिन दिल्ली में टैक्सी पर एक दिन में तीन-चार हजार रु. से कम खर्च नहीं होता ?

- जो भी हो, ये कम्पनी वालों का सिरदर्द था।

- तो आप कितनी बार गये होंगे ?

- पांच-छह बार तो गया ही था।

- यानि आपके आने-जाने पर ही कम्पनी का बीस हजार रु. खर्च हो गया।

- जो भी हुआ हो..।

- लेकिन शर्मा जी, दिल्ली में आजकल प्रदूषण बहुत हो गया है। सरकार चाहती है कि लोग निजी गाड़ियों का प्रयोग कम करें। जाम के कारण दस मिनट की यात्रा में कई बार एक घंटा लग जाता है। यदि आप डा. रोहन से दांत बनवाते, तो टैक्सी ने जो प्रदूषण फैलाया, वह बच जाता।

- आप भी कैसी बात कर रहे हैं वर्मा जी। डॉ. रोहन भले ही अपने पड़ोसी हों; पर उनके पास जाने से मेरे दस हजार रु. भी तो खर्च होते। अब मेरी जेब से एक पैसा भी खर्च नहीं हुआ। इतना ही नहीं, एक महीने की दवा भी वहीं से साथ में मिली है।

- लेकिन शर्मा जी, आप तो प्रदूषण मुक्ति के समर्थक हैं। पिछले महीने अपने मोहल्ले में इस बारे में जो सभा हुई थी, उसकी अध्यक्षता आपने ही की थी। आपका भाषण मुख्य वक्ता से भी अधिक जानदार था। सबसे अधिक तालियां भी आपको ही मिली थीं।

- हां-हां, मुझे सब याद है; लेकिन इसके चक्कर में मैं अपने पैसों में आग थोड़े ही लगा दूंगा ? देखो वर्मा जी, एक सीमा तक ये सब बातें सोचना और बोलना ठीक है। इससे आगे की बात वे नेता लोग जानें, जिन्हें इसके नाम पर राजनीति करनी है।

वहां से चलते समय मैंने सोचा, ऐसे लोगों के रहते क्या दिल्ली प्रदूषण से मुक्त हो सकेगी ? आप भी सोचिये..।

-विजय कुमार

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