रक्षा बंधन पर बहनें आज भी बनाती हैं पारम्परिक मांडना आकृतियाँ

रक्षा बंधन पर बहनें आज भी बनाती हैं पारम्परिक मांडना आकृतियाँ

डॉ. प्रभात कुमार सिंघल | Aug 14 2019 1:53PM
भाई बहन के प्यार का प्रतीक रक्षा बंधन का स्नेहिल पर्व हमारी भारतीय संस्कृति की गौरवमयी परंपरा का एक अभिन्न हिस्सा है। भाई की कलाई पर राखी बांधने को लेकर ही बहिन प्रफुल्लित हो उठती है। भाई भी कहीं भी हो इस दिन बहन के पास जाता है। सात समुंदर पार रहने वाले भाई को भी बहन रक्षासूत्र भेजना नहीं भूलती। हर बहन भाई को याद कर दीवारों पर खड़िया और गेरू से दीवार पर रेखाएं खींच कर सरवन बना कर अपने भाई का मोह बांध लेती है। समूचे उत्तर भारत में बहनों की यह परंपरा शिद्दत से चली आ रही है। बहनें घर के दरवाजों के दोनों और दीवारों पर रात को या जल्द तड़के में चौकोर या गोल गोबर से लीप कर छोड़ देती हैं। इसके सूखने पर सफेद खड़िया से इसे लीप देती हैं। अगर मांडने या सरवन सफेद बनाने हैं तो गेरू से भर देती हैं।
 
सफेद या लाल कैनवास तैयार हो जाने पर रेखाओं से आकृति बनाती हैं। सीधी आड़ी लकीरों के लिए धागे को रंग में भिगो कर दीवार पर रखती हैं और धागे को बीच से ऊपर खींच कर ढीला छोड़ देती हैं। एक सींख के आगे रुई लपेट कर एवं बांस की सींख के आगे के हिस्से को चाकू से थोड़ा चीर कर बीच में एक छोटी सींख फंसा कर दो मुई कुंची तैयार करती हैं।
अब रक्षा बंधन की परंपरागत कला को उकेरने के लिए उनके शिल्पी हाथ अपना कमाल दिखाते हैं। विभिन्न प्रकार की आकृतियाँ उकेरते हैं जिसे मांडना कहा जाता है। कहीं कहीं मांडने जमीन पर भी बनाये जाते हैं। बहन रक्षा बंधन के दिन सुबह मांडने की पूजा करती हैं और भाई की लंबी उम्र और मंगल जीवन की कामना करती हैं।
 
मांडना, मंडन शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ है सज्जा। मांडने को विभिन्न पर्वों, मुख्य उत्सवों तथा ॠतुओं के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है। इसे आकृतियों के विभिन्न आकार के आधार पर भी विभक्त किया गया है। उदाहरण-स्वरूप चौका, मांडने की चतुर्भुज आकृति है जिसका समृद्धि के उत्सवों में विशेष महत्व है जबकि त्रिभुज, वृत्त एवं स्वास्तिक लगभग सभी पर्वों या उत्सवों में बनाए जाते हैं। कुछ आकृतियों में आने वाले पर्व का निरूपण एवं उस दौरान पड़ने वाले पर्वों को भी बनाया जाता है। मांडना की पारंपरिक आकृतियों में ज्यामितीय एवं पुष्प आकृतियों को लिया गया है। इन आकृतियों में त्रिभुज, चतुर्भुज, वृत्त, स्वास्तिक, शतरंज पट का आधार, कई सीधी रेखाएँ, तरंग की आकृति आदि मुख्य है।
 
पुष्प आकृतियाँ ज्यादातर सामाजिक एवं धार्मिक विश्वास तथा जादू-टोने से जुड़ी हुई हैं जबकि ज्यामितीय आकृतियां तंत्र-मंत्र एवं तांत्रिक रहस्य से जुड़ी मानी जाती हैं। बहुत सारी आकृतियां किसी मुख्य आकृति के चारों ओर बनाई जाती हैं। ये आकृतियां सामाजिक एवं धार्मिक परंपरा पर आधारित होती हैं जिसमें वर्षों पुराने रीति-रिवाज तथा विभिन्न पर्वों में महिलाओं की दृष्टि को प्रदर्शित करती हैं।
 
मांडने रक्षाबंधन के साथ-साथ होली, दीपावली, मकर संक्रांति, दशहरा, नवरात्रि पर्व, सांझी, गणगौर, आदि पर्वों के साथ अन्य सामाजिक एवं धार्मिक अवसरों पर भी बनाने की परंपरा है। सजावट के सुंदर मांडने रंगों से, फूलों से, गुलाल से, पत्तियों से बनाये जाते हैं। इन्हें कहीं रंगोली तो कहीं अल्पना भी कहा जाता हैं। आज कल कागज पर बने मांडने भी मिलने लगे हैं। प्रायः शहरों में महिलाएं इनका ही प्रयोग करती हैं। घरों में हाथ से मांडने बनाने की कला का आगे की पीढ़ी को हस्तांतरण नहीं होना एवं लड़कियों का इस में रुचि नहीं लेना मांडना बनाने की कला में कमी का बड़ा कारण है। फिर भी कई बार मांडने की प्रतियोगितायें होने से रुचि बनी हुई है।
 
उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, पंजाब आदि राज्यों में आज भी आधुनिकता के दौर में रक्षा बंधन पर दीवारों पर परंपरागत खड़िया एवं गेरू के मांडने बनाने का प्रचलन बना हुआ है। यहां रक्षा बंधन की विशिष्ठ परम्पराओं में शामिल है मांडना चित्रण कला।
 
-डॉ. प्रभात कुमार सिंघल
(लेखक एवं पत्रकार)
 

रहना है हर खबर से अपडेट तो तुरंत डाउनलोड करें प्रभासाक्षी एंड्रॉयड ऐप


Disclaimer: The views expressed here are solely those of the author in his/her private capacity and do not necessarily reflect the opinions, beliefs and viewpoints of Prabhasakshi and do not in any way represent the views of Prabhasakshi.