राजस्थान के बाशिंदों को 63 सालों से है अपनी भाषा का इंतजार

राजस्थान के बाशिंदों को 63 सालों से है अपनी भाषा का इंतजार

देवेन्द्रराज सुथार | Mar 30 2019 3:42PM
राजस्थान संपूर्ण विश्व में अपने अदम्य साहस, पराक्रम, शौर्य, वीरता और बलिदान के लिए विख्यात है। इंग्लैंड के प्रसिद्ध कवि रुडयार्ड किपलिंग के शब्दों में- 'दुनिया में अगर कोई ऐसा स्थान है, जहाँ वीरों की हड्डियाँ मार्ग की धूल बनी हैं तो वह राजस्थान कहा जा सकता है।' यहाँ के कितने ही वीरों और वीरांगनाओं ने अपनी भक्ति और शक्ति का परिचय देकर इस भूमि की शोभा बढ़ाई है। जिनमें पृथ्वीराज चौहान, महाराणा प्रताप, मीराबाई, पद्मिनी, हाड़ी रानी, कर्मवती का नाम अग्रणी हैं। कर्नल टॉड की निगाह से देखें तो राजस्थान अपनी सांस्कृतिक-समृद्धि, अद्भुत पराक्रम, शौर्य एवं अनूठी परम्पराओं के कारण इतिहास के आकाश में एक उज्ज्वल नक्षत्र की तरह देदीप्यमान है। 
 
गौरतलब है कि 30 मार्च, 1949 को राजपूताना की रियासतों का विलय करके राजस्थान की स्थापना की गई थी। इसमें अजमेर मेरवाडा को छोड़कर सभी रियासतों को देशी राजा चलाते थे। हालाँकि, राजस्थान के एकीकरण की पूर्ण प्रक्रिया 1956 में पूरी हुई थी। दरअसल, कुल 22 रियासतों को मिलाकर सात चरणों में राजस्थान का गठन हुआ था। हीरा लाल शास्त्री राजस्थान के पहले मुख्यमंत्री थे। वर्तमान में क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान 33 जिलों व 7 संभागों के साथ देश का सबसे बड़ा राज्य है। राजस्थान में मौजूद चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, रणथंभौर, गगरांव, आमेर और जैसलमेर का किला यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट घोषित किया जा चुका है।
 
 
इन समस्त विशेषताओं को समेटे हुए राजस्थान के बाशिंदों को एक ओर अपनी जन्मभूमि पर गर्व है तो दूसरी ओर मलाल इस बात का है कि आजादी के इतने वर्षों के बाद भी उनकी राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता प्राप्त करने के लिए अब तक आठवीं अनुसूची में स्थान नहीं मिल पाया है। ज्ञातव्य है कि राजस्थानी को संवैधानिक दर्जा दिलाने को लेकर पहली दफा 1936 में मांग उठी थी। लेकिन राज्य की विधानसभा में इस भाषा पर 2003 में जाकर कोई एकराय बन पाई और प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया। केंद्र ने ओडिशा के वरिष्ठ साहित्यकार एस.एस. महापात्र की अगुआई में एक कमेटी बना दी। उसने दो साल बाद रिपोर्ट पेश की। इसमें राजस्थानी और भोजपुरी भाषा को संवैधानिक दर्जा का पात्र बताया गया। 2006 में उस वक्त के गृह मंत्री ने चौदहवीं लोकसभा के कार्यकाल में राजस्थानी को संवैधानिक दर्जा देने का भरोसा दिया। बाकायदा बिल भी तैयार कर लिया गया था। लेकिन पेश वह आज तक नहीं हो पाया। पंद्रहवीं लोकसभा के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान बीकानेर के सांसद अर्जुन राम मेघवाल ने राजस्थानी भाषा में शपथ लेनी चाही पर उन्हें रोक दिया गया। क्योंकि राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता प्राप्त नहीं थी। इसी कारण हाल ही में चुने गए तीन विधायकों द्वारा राजस्थानी में शपथ लेने की मांग की गई जिसे प्रोटेम स्पीकर गुलाब चंद कटारिया ने संविधान के हवाले से नकार दिया।
राजस्थानी को मान्यता नहीं देने के पीछे तर्क दिया जाता है कि इसकी क्षेत्रीय बोलियाँ अलग-अलग हैं। मसलन, मारवाड़ी भाषा जोधपुर, जैसलमेर और बीकानेर इलाके में बोली जाती है तो उदयपुर, भीलवाड़ा क्षेत्र में मेवाड़ी। बांसवाड़ा और डूंगरपुर का इलाका बागड़ी का है तो जयपुर अंचल में ढूंढाड़ी चलती है। कोटा और बूंदी क्षेत्र में हाड़ौती तो भरतपुर में मेवाती बोली जाती है। लेकिन यह तर्क उचित नहीं है? अगर इस लिहाज से देखें तो भारत में बोली जाने वाली हरेक क्षेत्रीय भाषाओँ में किसी में भी एकरूपता नहीं है हर पंद्रह-बीस किलोमीटर बाद भाषा में थोड़ा बदलाव आ जाता है। यह सवाल तो हिन्दी सहित दुनिया की किसी भी भाषा के लिए उठाया जा सकता है कि दिल्ली-मेरठ में खड़ी बोली-बोली जाती है, आगरा-मथुरा में ब्रज, ग्वालियर-झांसी में बुंदेली, फर्रूखाबाद में कन्नौजी, अवध में अवधी, बघेलखंड में बघेली, छतीसगढ़ में छतीसगढ़ी, बिहार में मैथिली और भोजपुरी, मगध में मगही। ऐसी स्थिति में हिन्दी भाषा किसे माना जाएगा? बंगाल और महाराष्ट्र में भी दर्जनों बोलियाँ हैं लेकिन वहाँ भी एक क्षेत्रीय भाषा है। फिर भी उन्हें संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित किया गया है तो राजस्थानी भाषा को सम्मिलित क्यों नहीं किया जा सकता?
 
स्मरण रहे कि भाषा विज्ञान राजस्थानी को एक स्वतंत्र भाषा मानता है। राजस्थानी के पास अपना समृद्ध शब्दकोश मौजूद है जिसमें दो लाख से ज़्यादा शब्द मौजूद हैं। एक अलग व्याकरण है। विस्तृत साहित्य है। हर भाषा की तरह इसकी भी बोलियाँ हैं जो इसे वैसे ही समृद्ध करती हैं, जैसे पेड़ को शाखाएँ। सवाल उठता हैं कि जब पंजाबी, मराठी, गुजराती से हिन्दी को कोई नुकसान नहीं पहुंचा तो राजस्थानी कैसे पहुंचा सकती है। हमें समझना होगा कि बोलियाँ किसी भी भाषा का शृंगार हुआ करती हैं। इस खूबी को भी खामी करार देना उचित नहीं है। कृष्ण भक्तिनी मीराबाई राजस्थानी में ही लिखती थीं। अजीब बात है कि राजस्थान को मीरा की धरती तो कहते हैं, लेकिन उस मीरा का यश बढ़ाने का काम जो भाषा करती है उसे खारिज कर दिया जाता है। महाराणा प्रताप पर गर्व तो सभी करना चाहते हैं, लेकिन जिस भाषा में वे बोला करते थे, वह स्वीकार नहीं। इसी वजह से नई पीढ़ी राजस्थानी भूलती जा रही है। अगर अब भी गंभीरता पूर्वक राजस्थानी को संवैधानिक दर्जा देकर इसके संरक्षण को लेकर अविलंब कदम नहीं उठाया गया था तो आने वाली नस्लें जब राजस्थानी भाषा को भूल चुकी होगी और सवाल करेगी तो हमारे पास मौन धारण करने के सिवाए कोई जवाब नहीं होगा। 
 
- देवेन्द्रराज सुथार

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