जीवन का हिस्सा बने अर्थ आवर तो मिलेगा समूची दुनिया को लाभ

जीवन का हिस्सा बने अर्थ आवर तो मिलेगा समूची दुनिया को लाभ

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा | Apr 5 2019 12:41PM
बात भले ही यह छोटी लगे पर इसके गंभीर मायने आज समझ में आने लगे हैं यही कारण है कि दुनिया के 180 देशों में इस साल 30 मार्च को रात एक घंटे तक बिजली बंद कर अर्थ आवर के माध्यम से जलवायु परिवर्तन की और दुनिया के देशों का ध्यान आकर्षित किया गया। मजे की बात यह है कि अर्थ आवर मनाने की यह मुहिम कोई ज्यादा पुरानी भी नहीं हैं और ऐसा भी नहीं है कि सारी दुनिया के देश इससे एक साथ जुड़ गए हो। पर यह भी सही है कि कॉमन कॉज होने के कारण शुरुआत के केवल तीन सालों में ही दुनिया के सैकड़ों देश स्वेच्छा से इस मुहिम से जुड़ गए। 2007 में आस्ट्रेलिया में अर्थ आवर की शुरुआत हुई और केवल तीन वर्ष यानी की चौथी साल 2010 में तो इस मुहिम से दुनिया के 120 देश जुड़ गए और इस साल 30 मार्च 2019 को दुनिया के 180 से अधिक देशों में अर्थ आवर मनाए जाने के समाचार प्राप्त हुए हैं। करीब 12 साल की इस यात्रा में दुनिया के देश प्रमुख स्थानों पर व स्वेच्छा से एक घंटे बिजली बुझा कर या मद्धिम कर या कैंडल मार्च के माध्यम से अर्थ आवर मनाकर एक संदेश देने का प्रयास कर रहे हैं। 
 
दरअसल मार्च के आखिरी शनिवार को अर्थ आवर डे मनाया जाता है। वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड के माध्यम से इसको प्रचारित किया जा रहा है। अर्थ आवर डे पर दुनिया के देशों के नागरिकों से केवल एक घंटे के लिए बिजली बंद करने का संदेश दिया जाता है। स्थानीय समय के अनुसार रात साढ़े आठ बजे से एक घंटे के लिए बिजली बंद कर लोगों को जलवायु परिवर्तन और कार्बन गैसों के उत्सर्जन से हो रहे नुकसान के प्रति सजग करने का प्रयास है। यह अच्छी तरह जानते है कि बिजली या पानी की बचत ही इनका उत्पादन होता है। 30 मार्च को हमारे देश में दिल्ली के इंडिया गेट, मुबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनल के साथ ही कई राजभवनों, मुख्यमंत्री निवासों व सार्वजनिक स्थानों पर या तो एक घंटे के लिए बिजली बंद की गई या बिजली की रोशनी मद्धिम कर अर्थ आवर मनाया गया। हमारे देश में ही नहीं अमेरिका की एंपायर स्टेट बिल्डिंग, हांगकांग की अनेक बिल्डिंगों, एफिल टावर, शिकागों में विलिस टावर आदि के बिजली गुल या मद्धिम कर अर्थ आवर का संदेश दिया गया। यह तो केवल बानगी मात्र है। यह भी सही है कि एक घंटे के लिए बिजली गुल करने या मद्धिम करने से कोई खास परिवर्तन या यों कहे कि कोई खास बिजली बचत नहीं होने वाली है पर इसके माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास है कि हमें बिजली की बचत करनी होगी। हमें बिजली बचत के साथ ही प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध उपयोग को कम करना होगा। बिजली के उत्पादन और बिजली के उत्पादों के अत्यधिक प्रयोग के कारण वातावरण पर पड़ रहे विपरीत प्रभाव के प्रति सजग होना होगा। 
आज पर्यावरण दुनिया की प्रमुख समस्याओं में से एक हो गया है। प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन और प्रकृति से खिलवाड़ का परिणाम है कि जलवायु में तेजी से परिवर्तन आने लगा है। आंधी तूफान बढ़े हैं। समुद्र किनारे के देशों में सुनामी और समुद्री तूफानों की संख्या में तेजी आई है। तबाही का नया मंजर देखने को मिला है। सैकड़ों किलामीटर की स्पिड के तूफान जन जीवन को अस्त व्यस्त करने के साथ ही लोगों की मौत का कारण बन रहे हैं। सर्दी, गर्मी और बरसात में घट−बढ़ हुई है। ग्लेसियर पिघलने लगे हैं। बर्फवारी में कमी आई है तो असमय बर्फवारी से लोग प्रभावित हो रहे हैं। धरती का तापमान बढ़ रहा है। असमय वर्षा और ओलावृष्टि आम होती जा रही है। मौसम चक्र प्रभावित हो रहा हैं। और तो और वायु प्रदुषण के चलते बिजिंग या दिल्ली जैसे अनेक शहरों के निवासियों के सामने सांस लेने के लिए शुद्ध हवा का झोंका तक मिलना दुभर होता जा रहा है। आखिर यह कब तक चलेगा। इसकी भी कोई सीमा है। केवल वायु प्रदूषण के चलते ही लाखों लोगों की जान जा रही है। दुनिया के देश पर्यावरण को लेकर सजग हो रहे हैं, बड़े बड़े सम्मेलन हो रहे हैं, समझौते हो रहे हैं पर प्रदूषण का स्तर कम होने का नाम ही नहीं ले रहा। प्रकृति का विकृत रुप सामने आता जा रहा है। बाते बहुत की जा रही है पर ठोस प्रयास अभी भी शेष है। ऐसे में दुनिया के देशों में अर्थ आवर जैसे आयोजनों की आवश्यकता व सामयिकता बहुत जरुरी हो गई है। प्रदूषण के कारण सांस लेना तक दुभर होता जा रहा हैं। नई नई बीमारियां आ रही है। कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियां बढ़ रही है। ना जाने कौन कौन से वाइरल मौत का कारण बनते जा रहे हैं। 
हालात यह होते जा रहे हैं कि सर्दी में कड़ाके की सर्दी नहीं तो बारिश के मौसम में एक दो बारिश से ही संतोष करना पड़ता है। चौमासा घट कर चार दिन का रह गया है और वह भी तबाही का कारण बन जाता है। ऐसे में दुनिया के देशों को गंभीर होना होगा। प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन पर रोक लगानी होगी वहीं प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने के सार्थक प्रयास करने होंगे। अर्थ आवर इस दिशा में बढ़ता कदम है और इसे एक दिन ही मनाने के स्थान पर यदि हम अपनी आदतों में सुधार करें, बिना काम उपयोग ना करे, पर्यावरण को संरक्षित रखने वाले उपकरणों के प्रयोग को बढ़ावा दें और बिजली पानी आदि का अनावश्यक उपयोग ना करे तो ही काफी कुछ सुधार की संभावनाएं बन जाती है। पिछले दिनों न्यायालय द्वारा 100 पेड़ लगाने की सजा देना इस दिशा में सकारात्मक कदम माना जा सकता है जिससे कुछ सकारात्मक सबक मिल सके। दुनिया के गैरसरकारी संगठनों को इस दिशा में और अधिक सक्रिय भूमिका निभानी होगी तभी अर्थ आवर मनाने का लाभ मिल सकेगा। फिर भी संकेतात्मक ही हो पर लोगों की समझ बढ़ने लगी है। अर्थ आवर एक आंदोलन का रुप ले और यह एक दिन और एक घंटे का नहीं बल्कि हर व्यक्ति का अपना कार्यक्रम बनेगा तो इसका लाभ समूची दुनिया को मिलेगा।
 
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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