समसामयिक

तेल के दाम अगर इसी तरह बढ़ते रहे तो चुनावों में भाजपा को नुकसान होना तय

By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Sep 12 2018 1:03PM

राजस्थान की भाजपा और आंध्र प्रदेश की सत्तारूढ़ तेलुगू देशम पार्टी ने डीजल−पेट्रोल का वैट घटाकर केन्द्र की भाजपा सरकार के लिए मुश्किल खड़ी कर दी है। आगामी विधान सभा और लोकसभा चुनाव की दृष्टि से लिये गए इस फैसले से भाजपा भारी दबाव में आ गई है। सत्तारूढ़ भाजपा आंध्र प्रदेश में वैट में कमी को लेकर तो कह सकती थी कि यह आंध्र प्रदेश का अन्दरूनी मामला है। किन्तु राजस्थान में भाजपा सरकार होने से केंद्र के गले में फांस अटक गई है। कांग्रेस तेल के दामों में कमी को लेकर राष्ट्रीय मुद्दा बना चुकी है। इसके लिए भारत बंद का आयोजन किया गया।

अभी तक केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता डीजल−पेट्रोल के दामों में बढ़ोतरी को लेकर तेल की कीमतों को अंतरराष्ट्रीय दामों से जोड़ने की दुहाई देते रहे हैं। इसमें कटौती को लेकर केंद्रीय योजनाओं पर असर पड़ने की दलीलें देते रहे हैं। इसके अलावा तेल कम्पनियों की स्वायत्तता का तर्क भी दिया जाता रहा है। राजस्थान की भाजपा सरकार की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने डीजल−पेट्रोल में चार प्रतिशत की कमी से केंद्र सरकार को संकट में डाल दिया। हालांकि राजे ने यह कदम आगामी विधानसभा चुनाव में मतदाताओं को रिझाने के लिए उठाया है।

इससे पहले केंद्र सरकार भी कर्नाटक और गुजरात विधान सभा चुनाव से पहले तेल की कीमतों में बढ़ोतरी को टाल गई थी। तब भी भाजपा नेताओं की ओर से यह दलील दी गई कि तेल कम्पनियों के दाम घटाने−बढ़ाने से उसका कोई सरोकार नहीं है। चुनाव सम्पन्न होते ही इन दोनों राज्यों में दाम बढ़ा दिए गए। इससे पहले केंद्र सरकार ऐसा करने के लिए अपनी भूमिका से इंकार करती रही। इसके लिए तेल कम्पनियों को ही जिम्मेदार बताया गया। कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों ने तब भी इस मुद्दे पर खूब आरोप लगाए। चुनाव के दौरान दाम नहीं बढ़ाना और मतदान सम्पन्न होते ही कीमतों में वृद्धि करने से केंद्र सरकार की चुनाव चाल उजागर हो गई। अब ठीक इसी राह पर राजस्थान की भाजपा सरकार है। डीजल−पेट्रोल पर वैट में 4 प्रतिशत की कमी करके वसुंधरा राजे ने तेल की बढ़ती कीमतों को लेकर मतदाताओं के आक्रोश पर ठंडे छींटे मारने का प्रयास किया है। ऐसा नहीं है कि वसुंधरा सरकार ने आगे किसी तरह की बढ़ोत्तरी नहीं करने का वादा किया हो। यह निश्चित है कि चुनाव में यदि राजस्थान में फिर से भाजपा की सरकार बनती है, तब तेल के वैट में कटौती की कसर निकालने से सरकार बाज नहीं आएगी। भाजपा को इस बात का एहसास है कि चुनाव जीतने के बाद पांच साल तक कुछ नहीं बिगड़ने वाला, बेशक विपक्ष कितना ही शोर-शराबा क्यों न करे। इसके विपरीत सत्तारूढ़ दल यह कह कर बच निकलने का प्रयास करते रहे हैं कि पूर्व में विपक्षी दल ने भी सत्ता में रहते हुए ऐसा किया था।

यह संभव है कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने पार्टी की गोपनीय सहमति से यह कदम उठाया हो। इस बात की संभावना इसलिए भी अधिक है कि भाजपा को लोकसभा का चुनाव लड़ना है। तेल की कीमतों में बढ़ोत्तरी का मुद्दा राष्ट्रीय है। यह भी संभव है कि इसके बाद मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार भी वैट में कमी की घोषणा कर दें। इन राज्यों में भी विधान सभा चुनाव होने हैं। राजस्थान में वैट में कटौती के बाद निश्चित तौर पर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकारों पर भी ऐसा करने का दबाव बढ़ गया है और भाजपा के पास यह कहने को कि, उसने पहले ही इस मुद्दे पर राज्यों से अपने स्तर पर निर्णय करने को कह रखा है। कोई आश्चर्य नहीं कि मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान और छत्तीसगढ़ में रमन सिंह सरकार आगामी कुछ दिनों में तेल के वैट में कटौती की घोषणा करके मतदाताओं को मनाने का प्रयास करें।

यह भी तय है कि यदि ऐसा होता है तो यह सब भाजपा की विधानसभा चुनावों की रणनीति का हिस्सा होगा। कुछ हद तक संभव है कि लोकसभा चुनाव से पहले केंद्र सरकार भी कुछ महीनों के लिए तेल की दरों में कटौती कर दे। अभी से कटौती करने से केंद्र सरकार भारी आर्थिक नुकसान नहीं उठाना चाहती। लोकसभा चुनाव में कुछ महीने शेष रहने पर ऐसा कदम उठाये जाने की संभावाना अधिक है। ऐसा नहीं है कि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व और केंद्र सरकार को डीजल−पेट्रोल के दामों में लगातार बढ़ोतरी से मतदाताओं की नाराजगी का अंदाजा नहीं है।

इस मुद्दे पर संगठन और सरकार तेल और तेल की धार देखने की नीति पर अमल कर रहे हैं। देख रहे हैं कि देश के मतदाता किस हद तक बढ़ी हुई कीमतों को बर्दाश्त कर सकते हैं। अभी तक कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों ने ही यह मुद्दा बनाया हुआ है। केंद्र सरकार अभी से कमी करके भारी आर्थिक नुकसान वहन करने को तैयार नहीं है। चुनाव से ठीक पहले कटौती करके केंद्र सरकार कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों या इनके गठबंधन से तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का मुद्दा छीन कर उसे विफल कर सकती है। राजस्थान में वैट पर 4 प्रतिशत कटौती से राज्य के खजाने पर 2 हजार करोड़ रूपए का अतिरिक्त भार पड़ेगा। इससे वित्तीय घाटे में एक हजार करोड़ रूपए की बढ़ोतरी होगी। कमोबेश यही हालत आंध्र प्रदेश की भी है। राज्य के खजाने पर घाटे के बोझ में बढ़ोतरी होगी।

संभावना यही है कि चुनाव होते ही सरकारें वित्तीय कुप्रबंधन को रोकने की बजाए इस नुकसान की भरपाई को वैट बढ़ा कर पूरा करने में जुट जाएंगी। चुनाव के बाद वैसे भी विपक्षी दल कुछ नहीं बिगाड़ सकते। आगामी चुनाव तक मतदाताओं के सामने पांच साल की अवधि में कई दूसरे मुद्दे सामने आ जाते हैं। यह भी जरूरी नहीं है कि तेल के वैट में कमी करना मात्र ही चुनावी वैतरणी पार करने का साधन बने। चुनावी राज्यों में दूसरे कई मुद्दे भी चुनाव को प्रभावित करने के कारण हैं। इनमें भ्रष्टाचार, रोजगार, स्वशासन और विकास प्रमुख हैं। यही मुद्दे लोकसभा चुनाव में भी हावी रहेंगे। फिलहाल इन सभी मुद्दों पर तेल की कीमतों का मुद्दा हावी है। आम लोगों को न सिर्फ तेल की बढ़ी हुई कीमतें बल्कि इससे बढ़ी हुई लागत से दूसरी वस्तुओं के ज्यादा दाम चुकाने पड़ रहे हैं। यह भी निश्चित है कि सत्ता में चाहे किसी भी दल की सरकार हो, सभी के चुनावी हथकंडे एक जैसे ही होते हैं। सभी दलों का प्रयास चुनाव से पहले मुक्त हस्त से बांटने और उसके बाद वसूलने का रहता है।

-योगेन्द्र योगी

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