धार्मिक ग्रंथों की बेअदबी पर पंजाब सरकार का नया कानून वोटों की राजनीति

धार्मिक ग्रंथों की बेअदबी पर पंजाब सरकार का नया कानून वोटों की राजनीति

राकेश सैन | Sep 12 2018 3:03PM
पंजाब में कांग्रेस के नेतृत्व वाली कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार ने हाल ही में भारतीय दंड विधान की धारा 295-ए में संशोधन कर 295-एए का प्रस्ताव केंद्र के पास भेजा है। यह संशोधन लागू हो जाता है तो राज्य में धर्मग्रंथों जिनमें श्रीमद्भगवद गीता, श्री गुरु ग्रंथ साहिब, पवित्र कुरान और पवित्र बाईबल का अपमान करने वाले को उम्रकैद की सजा दी जा सकेगी। इस तरह का संशोधन 22 मार्च, 2016 को अकाली दल बादल और भारतीय जनता पार्टी की सरकार भी लेकर आई थी परंतु उसमें केवल श्री गुरु ग्रंथ साहिब को शामिल किया गया। केंद्र ने यह कहते हुए इस संशोधन को निरस्त कर दिया कि धर्मनिरपेक्ष देश में किसी एक धर्म विशेष को रियायत नहीं दी जा सकती। राज्य में दो साल पहले हुई श्री गुरु ग्रंथ साहिब के अपमान की घटनाओं को लेकर हाल ही में सेवानिवृत न्यायाधीश रणजीत सिंह आयोग की रिपोर्ट पर विधानसभा में बहस हुई है, जिसमें अकाली-भाजपा विधायकों की अनुपस्थिती में सत्ताधारी दल व आम आदमी पार्टी के विधायकों ने इन घटनाओं के लिए अकाली दल को खूब कोसा। लगता है कि जनता में पनपी भावनाओं का राजनीतिक दोहन करने के लिए कांग्रेस सरकार ने नए सिरे से 295-एए संशोधन पेश किया और इसमें श्री गुरु ग्रंथ साहिब के साथ उक्त ग्रंथ भी जोड़ दिए। राजनीतिक दलों की वोट बटोरने की इस कला को आग से खेलना कहा जाना कोई अतिशयोक्ति न होगा क्योंकि अगर यह क्रम आगे बढ़ा और अन्य राज्य भी इसी मार्ग पर चले तो इसकी बहुत बड़ी कीमत देश की लोकतांत्रिक प्रणाली को चुकानी पड़ सकती है। कुछ विद्वानों ने पंजाब सरकार के इस संशोधन को पाकिस्तान के कुख्यात ईशनिंदा कानून के समकक्ष भी प्रस्तुत किया है और इस आशंका को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता।
 
पंजाब में धर्म का विषय कितना संवेदनशील है इसका अनुमान इन दो घटनाओं से ही लगा सकते हैं। चिंता की बात है कि इनके अनुभव को कैप्टन सरकार ने ध्यान में नहीं रखा है, जिसके चलते दो महिलाएं मार दी गईं। 9 सितंबर, 2016 को बलविंदर कौर नामक महिला अमृतसर के वेरोके गांव में अपने घर में ही कत्ल कर दी गई तो दूसरी बलविंदर कौर को एक साजिश रचकर कट्टरपंथियों ने मार गिराया। वेरोके गांव की 55 वर्षीय बलविंदर कौर जमानत पर रिहा होकर आई थी। गुरु ग्रंथ साहिब को अपवित्र करने पर उसे 10 नंवबर, 2015 को जेल भेजा गया था। बलविंदर कौर का अपराध था कि वह चप्पल पहन कर वहां गुरुद्वारे के अंदर पहुंच गई। हंगामा इस कदर बढ़ा जो उसकी गिरफ्तारी से ही शांत हो सका। एक माह बाद उसे जमानत मिली, मगर कट्टरपंथी लोगों में उत्तेजना इस कदर रही है कि उसका परिवार सामाजिक बहिष्कार का भी शिकार बनाया गया। बाद में उसके पति को ही उसकी हत्या में गिरफ्तार किया गया।
 
दूसरी घटना में 27 जुलाई, 2016 को लुधियाना जिले में एक और बलविंद्र कौर मारी गई। वह घवाड़ी गांव की रहने वाली थी और वह भी गुरु ग्रंथ साहिब की 'बेअदबी' के मामले में जमानत पर रिहा होकर आई थी। वह दो दशकों से गुरुद्वारे में काम कर रही थी और उस पर यह आरोप लगा कि उसने ग्रंथ साहिब के पन्ने (स्थानीय भाषा में अंग) फाड़ दिए, जबकि उसके परिवार वालों का कहना था कि गांव के वर्चस्वशाली लोगों ने उसे फंसाया है। उसे किसी ने फोन करके आलमगिर के गुरुद्वारा मांजी साहिब के सामने बुलाया तथा आश्वासन दिया था कि वह उसे स्वर्ण मंदिर ले जाएंगे ताकि उस पर लगा यह दाग मिट जाए। जब वह अपने बेटे के साथ ऑटो में बैठ कर वहां पहुंची तो वहां पहले से खड़े दो मोटरसाइकिल सवारों ने उसे गोलियों से भून डाला। इस मामले में पकड़े गए दो अभियुक्त एक कट्टरपंथी संगठन से संबंधित बताए गए हैं। अनुमान लगाएं कि अगर इस मानसिकता के हाथों में उस सख्त कानून की शक्ति भी आ जाए जिसमें आरोपी को उम्रकैद का प्रावधान हो तो कितना अनर्थ होगा। वही गलती कांग्रेस सरकार विधानसभा में संशोधन पेश करके कर चुकी है। प्रश्न है कि इन अपराधों से निपटने के लिए पहले से ही भारतीय दंड संहिता की धारा 295-ए का पूरे देश में प्रावधान है तो नए कानून की क्या जरूरत है और नया कानून आग में घी नहीं डालेगा इसकी क्या गारंटी है?
 
आईपीसी की धारा 295-ए पहले से ही अपने आप में कठोर विधान है। इसके अनुसार जो कोई किसी उपासना के स्थान को या व्यक्तियों के किसी वर्ग द्वारा पवित्र मानी गई किसी वस्तु को नष्ट, क्षतिग्रस्त या अपवित्र इस आशय से करेगा कि किसी वर्ग के धर्म का द्वारा अपमान किया जाए या यह सम्भाव्य जानते हुए करेगा कि व्यक्तियों का कोई वर्ग ऐसे नाश, नुकसान या अपवित्र किए जाने को अपने धर्म के प्रति अपमान समझेगा, तो उसे किसी एक अवधि के लिए कारावास जिसे दो वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है, या आर्थिक दण्ड, या दोनों से दण्डित किया जाता है। यह एक गैर-जमानती, संज्ञेय अपराध है और किसी भी मेजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है। और तो और यह अपराध समझौता करने योग्य नहीं है। आवश्यकता धर्म ग्रंथों का अपमान करने वालों को पहचानने, इन घटनाओं को रोकने के पूर्ववर्ती प्रयास करने और आरोपियों को दंडित करने की है न कि ऐसे नए कानून की जो भारतीय समाज को ईशनिंदा के धरातल पर पाकिस्तान जैसे मजहबी देश की पंक्ति में खड़ा कर दे।
 
दुर्योग ही है कि पाकिस्तान के कुख्यात ईशनिंदा कानून की नींव भी पंजाब में ही पड़ी थी। साल 1926 में आर्य समाजी चिंतक महाश्य राजपाल की पब्लिकेशन ने 'रंगीला रसूल' नामक पुस्तक का प्रकाशन किया जिसमें इस्लाम के संस्थापक हजरत मोहम्मद साहिब के चरित्र के बारे में टिप्पणी की गई। मुस्लिम लीग के लोगों की शिकायत पर पुलिस ने महाश्य पर दो समुदायों में वैमनस्य फैलाने के आरोप में धारा 153-ए के तहत मामला दर्ज किया। महाश्य ने लाहौर उच्च न्यायालय में इस आधार पर याचिका दायर की कि किसी धार्मिक व्यक्ति के खिलाफ टिप्पणी करने पर धारा 153-ए लागू नहीं होती। इसी आधार पर न्यायालय ने महाश्य राजपाल को आरोप मुक्त कर दिया। मुसलमानों ने इसका विरोध किया और अंग्रेज सरकार ने 1927 में धारा 295-ए की व्यवस्था की। इस धारा को पेश करते समय इसका समर्थन करते हुए वायसराय काऊंसिल के सदस्य मोहम्मद आली जिन्नाह (जो बाद में पाकिस्तान के संस्थापक बने) ने कहा- मैं इस सिद्धांत का पूरी तरह से समर्थन करता हूं कि इस उपाय को उन अवांछित व्यक्तियों का लक्ष्य रखना चाहिए जो किसी भी विशेष वर्ग के धर्म या किसी धर्म के संस्थापक और भविष्यवक्ताओं पर आक्षेप करना चाहते हैं, वे जो धर्म की सच्ची और ईमानदार आलोचना में व्यस्त हैं, उन्हें संरक्षित किया जाएगा। रोचक बात तो यह है कि पंजाब विधानसभा में आईपीसी की धारा 295-एए (पंजाब संशोधन) को पेश करते समय कांग्रेस सरकार ने भी लगभग ऐसी ही दलील दी।
 
अंग्रेजों द्वारा बनाया गया कानून 295-ए सीमा के उस पार ईशनिंदा कानून का राक्षसी रूप धारण कर चुका जो हर साल कई बेकसूरों को निगल जाता है। वहां अब ऐसी परिस्थितियां तैयार हो चुकी हैं कि ईशनिंदा कानून पर सवाल उठाना भी ईशनिंदा में शामिल किया जाने लगा है, जिसके चलते पाकिस्तानी पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शाहबाज भट्टी को जान से हाथ धोना पड़ा। सीमा के इस पार उस तरह की पृष्ठभूमि तैयार करने का प्रयास हो रहा लग रहा है। भारत के दंड विधान की धारा 295 एक- जिसमें एक पूरा अध्याय 'धर्म से संबंधित उल्लंघनों' को लेकर है वह 'धर्म' या 'धार्मिकता' को परिभाषित नहीं करता। कहने का तात्पर्य कि पंजाब सरकार का यह कानून जो धार्मिक '(जिसकी स्पष्ट व स्टीक व्याख्या नहीं की जा सकती) भावनाओं (बहुत धुंधला व पेचीदा विषय) को आहत करने के नाम पर लोगों को जिंदगी भर जेलों में डाल सकता है। आहत भावनाओं की यह दुहाई किस तरह व्यक्ति को बुरी तरह प्रताड़ित करने का रास्ता खोलती है, इसका उदाहरण हम किकू शारदा के मसले में देख चुके हैं। डेरा सच्चा सौदा के संचालक बाबा राम रहीम सिंह की नकल उतारने के बाद उसके अनुयायियों ने किकू के खिलाफ केस दर्ज किया और प्रताड़ना का सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक गिरफ्तारी में चल रहे किकू को खुद बाबा ने 'माफ' नहीं किया। इस तरह के धर्मांध लोगों के हाथ में सख्त कानून का दंड भी पकड़ाना कहां की समझदारी है। देश में जिस तरह विभिन्न कारणों से धर्म एक संवेदनशील विषय बनता जा रहा है हमारी सरकारों व राजनीतिक दलों को इस तरह के मामलों पर सोच समझ कर कोई कदम उठाना चाहिए। पंजाब सरकार ने अपना दांव चल दिया है और अब गेंद केंद्र के पाले में है, आशा है कि केंद्र सरकार सभी पक्षों को ध्यान में रख कर कोई निर्णय करेगी।
 
-राकेश सैन

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