गया के इस विष्णु मंदिर की है बहुत मान्यता, यहां दिखते हैं भगवान के पदचिह्न

गया के इस विष्णु मंदिर की है बहुत मान्यता, यहां दिखते हैं भगवान के पदचिह्न

कमल कुमार सिंघी | Sep 29 2018 4:08PM
भोपाल। पितृ या पितर, साल के वे 15 दिन जब लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के पूजन इत्यादि कर्म करते हैं। यहां हम आपको एक ऐसे स्थान के बारे में बताने जा रहे हैं जो पूरे देश में ही नहीं विदेशों में भी प्रसिद्ध है। यहां आमतौर पर तो लोग पितृ पक्ष के दौरान पहुंचते हैं, लेकिन आम दिनों में भी भक्तों को यहां देखा जा सकता है। जैसा कि पुराणों में वर्णित है कि सृष्टि के पालन कर्ता भगवान श्रीविष्णु का निवास धरती में जगह-जगह है। उन्हीं में से एक जगह है गयाजी, जो कि बिहार राज्य में स्थित है। यहां पर ही बना है यह अद्भुत और अनोखा भगवान विष्णु का मंदिर।
 
कहा जाता है कि यह मंदिर भगवान विष्णु के पदचिह्नों पर ही बना है जो कि यहां देखने को भी मिलते हैं। इसी वजह से इसे विष्णुपाद मंदिर कहा जाता है। फल्गु नदी के पश्चिमी किनारे पर स्थित यह मंदिर पर्यटकों के बीच काफी लोकप्रिय है।
 
40 सेमी लंबे पैर
 
यह मंदिर 30 मीटर ऊंचा है जिसमें 8 पिलर्स हैं। इन पिलर्स पर चांदी की परतें चढ़ाई हुई हैं। मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु के पैरों के निशान हैं जो कि लगभग 40 सेमी लंबे बताए जाते हैं। ये देखने पर ही अति दिव्य दिखाई देते हैं। इस मंदिर का 1787 में इंदौर की महारानी अहिल्या बाई ने नवीकरण करवाया था। जिसके बाद से इसकी भव्यता और बढ़ गई।
 
पुण्यलोक को प्राप्त करते हैं पूर्वज
 
पितृपक्ष के अवसर पर यहां श्रद्धालुओं की काफी भीड़ जुटती है। इसे धर्मशिला के नाम से भी जाना जाता है। ऐसी भी मान्यता है कि पितरों के तर्पण के पश्चात इस मंदिर में भगवान विष्णु के चरणों के दर्शन करने से समस्त दुखों का नाश होता है एवं पूर्वज पुण्यलोक को प्राप्त करते हैं। विष्णुपाद मंदिर में बने चरणों की अंगुलियां उत्तर की ओर हैं और मंदिर तकरीबन 100 फीट का है।
 
होता है भव्य श्रृंगार
 
इन पदचिह्नों का श्रृंगार भी रक्त चंदन से किया जाता है। इस पर गदा, चक्र, शंख आदि अंकित किए जाते हैं। यह परंपरा भी काफी पुरानी बतायी जाती है जो कि मंदिर में अनेक वर्षों से की जा रही है। भगवान विष्णु का भी विशेष अवसरों पर भव्य श्रृंगार किया जाता है। इसके अतिरिक्त भी गया में अनेक तीर्थस्थल हैं, किंतु यहां सर्वाधिक भक्त देखने को मिलते हैं। पितृपक्ष के दौरान यहां लगभग मेले का माहौल देखने मिलता है। यहां अनेक लोक कथाएं एवं जनश्रुतियां प्रचलित हैं जिनमें से एक यह है कि यदि आप इस तीर्थ स्थान के नाम का स्मरण कर सच्चे हृदय से हाथ पसारते हैं तो निश्चित ही हाथ में पानी की दो बूंदें गिरती हैं।
 
- कमल कुमार सिंघी

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