कुम्भ मेला में स्नान, दान और संतों के साथ सत्संग कर जीवन सफल बनाएं

कुम्भ मेला में स्नान, दान और संतों के साथ सत्संग कर जीवन सफल बनाएं

प्रो. सुधांशु त्रिपाठी | Jan 28 2019 5:49PM
भारतीय संस्कृति की गंगा का जन्म जिस हिमालय से हुआ है वह है अध्यात्म। विश्व में यदि आज भी भारत की कोई मौलिक पहचान है तो वह इसकी आध्यात्मिक समृद्धि से ही है। भ्रष्टाचार, अनाचार के दलदल में डूबते भारत देश तथा भारतीय संस्कृति को यदि कोई सुरक्षित रखे हुए है तो वह इसके मूल में विद्यमान सुदृढ़ आध्यात्मिकता ही है। यह आस्थावान लागों का देश है। इस विशाल देश में बहुरंगी संस्कृति, जीवन शैली, बोली, भाषा आदि का अपूर्व संगम है किन्तु ऋषियों, साधु−सन्तों एवं विद्वानों द्वारा अर्जित ज्ञान की सुदृढ़ रज्जु एक बहुरंगी माला की तरह सभी को एक सूत्र में पिरोये हुए है। यहां के निवासियों का अहिंसा एवं शांतिवादी तथा संपूर्ण मानवता के कल्याण की कामना से ओतप्रोत समग्रता पूर्ण चिन्तन भारतीय संस्कृति का मूल लक्षण है। यही कारण है कि कुम्भादि पर्वों पर तीर्थादि में एकत्र होने वाला विशाल जनमानस किसी भी भारतीय को आश्चर्य चकित नहीं करता यद्यपि महाकुम्भ विश्व का सबसे बड़ा मानव मेला है। तीर्थराज प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन तथा नासिक में पड़ने वाले ये कुम्भ पर्व, निःसंदेह संपूर्ण भारतवासियों को आपस में जोड़ते हैं तथा सर्वे भवन्तु सुखिनः एवं वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को साक्षात् मूर्तिमान करते हैं। तीर्थराज प्रयाग में महाकुम्भ एवं अर्द्ध कुम्भों में स्नान, जप, दान आदि का महत्व भी पुराणों में वर्णित है। अमावस्यायुक्त मकर राशि पर सूर्य और चन्द्र तथा वृष राषि पर गुरु के कारण प्रयाग में महाकुम्भ का योग आता है−
 
 
माघे वृष गते जीवे मकरे चन्द्रभास्करौ।
अमावस्या ततो योगः कुम्भारव्य तीर्थनायके।।
 
प्रयागराज में कुम्भ स्नान, दान, वेणीमाधव जी के दर्शन तथा संत−महात्माओं के सत्संग का विशेष माहात्म्य है। पद्म पुराण के अनुसार−
          
प्रयागेतु नरो यस्तु माघ−स्नानं करोति च।
न तस्य फल−संख्यास्ति श्रृणु देवष सत्तिम।।  
 
सूर्य, चंद्र एवं बृहस्पति का विभिन्न राशियों में संक्रमण का यह काल अत्यंत मांगलिक एवं पुण्यकारी माना गया है। विष्णु पुराण में तो यहां तक कहा गया है कि एक हजार कार्तिक स्नान, एक सौ माघ स्नान और एक करोड़ वैशाख स्नान के बराबर कुम्भ स्नान का फल है−
 
सहस्त्रं कार्तिके स्नानं माघस्नानं शतानि च।
वैशाखे नर्मदा कोटि कुम्भस्नानतत्फलम्।।
 
कुम्भ का जहां एक ओर आध्यात्मिक−धार्मिेक महत्व है, वहीं दूसरी ओर इसका लौकिक तार्किक महत्व भी कम नहीं है। इसीलिये सूर्य, चंद्र एवं बृहस्पति का विभिन्न राशियों में संक्रमण का यह काल अत्यंत मांगलिक एवं पुण्यकारी तो माना ही गया है साथ ही ज्योतिषीय गणना के अनुसार ऐसी मान्यता है कि कुम्भ योग की ग्रह−नक्षत्र स्थिति में सूर्य की किरणें जल को अधिक औषधियुक्त बनाती हैं। कुम्भ पर्व से सम्बन्धित देव−दानव युद्ध, समुद्रमंथन का घटित होना, अमृत की प्राप्ति जिसे दानवों से बचाने के लिए गरुड़ का अमृत कलश लेकर भागना, अमृत का चार तीर्थ स्थलों पर छलक जाना तथा उन्हीं तीर्थ स्थलों पर विभिन्न ग्रह−दशाओं के सुंदर सुयोग से उत्पन्न शुभ मुहूर्तों पर कुम्भ पर्व का आयोजित होना आदि कथाओं का वर्णन विभिन्न पौराणिक शास्त्रों में मिलता है।
 
 
प्रस्तुत लेख में कुम्भ के एक अन्य प्रतीक का उल्लेख किया गया है जिसका आधार मानव का शरीर है। शास्त्रों में बहुशः वर्णित 'यत्पिंडे तत् ब्रह्माण्डे' का सूत्र यहां सर्वथा समीचीन है, अर्थात् जो कुछ इस पिण्ड में है उसी का विस्तार ब्रह्माण्ड में है। वस्तुतः जो यहां अर्थात् शरीर में है वही सर्वत्र व्याप्त है और जो यहां नहीं है वह कहीं नहीं है। कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया तथा कुम्भ पर्व की पकिल्पना में भी विद्वानों ने पर्याप्त साम्य का अनुभव किया है। वस्तुतः कुम्भ पर्व बाह्य जगत में ही नहीं अपितु अन्तर्जगत में भी अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। योगी−जन जब कुंडलिनी योग के माध्यम से इड़ा, पिंगला तथा सुषुम्ना नाड़ियों की त्रिवेणी में स्नान कर ब्रह्म रन्ध्र में परमानंद की प्राप्ति रूपी अमृत का पान करते हैं तो यही मानो उनका कुम्भ स्नान है। बिना किसी दृष्यमान जनसंपर्क के करोड़ों व्यक्तियों की एक ही स्थान पर उपस्थिति जनसंपर्क विज्ञान के लिए भी एक पहेली है किंतु यह वस्तुतः भारतीय संस्कृति की सुदृढ़ एकता का एक सुंदर एवं सशक्त निदर्शन है। यही हमारी पहचान है। 
 
-प्रो. सुधांशु त्रिपाठी
आचार्य, उ.प्र. राजर्षि टण्डन मुक्त विश्वविद्यालय, 
प्रयागराज, उ.प्र.

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